2 October 2020

मोहनदास करमचंद गांधी -परिचय

 महात्मा गांधी (मोहनदास करमचंद गांधी) का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर गुजरात मे हुआ था|  इनके पिताजी करमचंद गांधी और माताजी पुतलीबाई  थी|

इनकी शादी 1883 ई मे  कस्तूरबा गांधी से हुयी थी   |

महात्मा गांधी के 4 पुत्र थे -हरिलाल, मणिलाल, रामदास, देवदास |




| 1888 में कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए और उन्होंने 1891 में कानून की डिग्री प्राप्त की, और फिर  दादा अब्दुल्ला के मुकदमे के सिलसिले में 1893 ई मे दक्षिण अफ्रीका  जाते हैं  और वहां पर 1894 ईसवी में नटाल कांग्रेस  की स्थापना करते हैं |

दक्षिण अफ्रीका में जुलू  व  बोयर पदक 1899 मे  प्राप्त करते हैं |

डरबन अफ्रीका में फीनिक्स आश्रम की स्थापना 1904 में किया,

सत्याग्रह का प्रथम प्रयोग 1906 मे दक्षिण अफ्रीका मे किया ,तथा  जेल जीवन का प्रथम अनुभव 1908 ई  में हुआ|

|भारत मे उनके  राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले  थे |

कांग्रेस के 1901 में हुए कोलकाता अधिवेशन में प्रथम बार शामिल हुए | इसके अलावा 1924 में बेलगांव कर्नाटक में  कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष भी रहे |

9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका से भारत आते हैं और 1915 ई मे ही  साबरमती आश्रम की स्थापना करते हैं | इनकी आत्मकथा -सत्य के प्रयोग(1925 ) हैं  |

गांधीजी के अनुसार राज्य राम राज्य के युगल सिद्धांत -सत्य एव अंहिंसा हैं |


 महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता- सुभाष चंद्र बोस ने,.... बापू - पंडित जवाहरलाल नेहरूने ....   महात्मा- रविंद्र नाथ टैगोर ने कहा जबकि   मलंग बाबा- खुदाई खिदमतगार ने कहा....  "अर्धनग्न फकीर"  विंस्टन चर्चिल ने कहा .... जादूगर - शेख मुजीब उर रहमान ने कहा |


इनकी प्रमुख पुस्तकें "इंडिया ऑफ माय ड्रीम" "अनासक्ति योग"  "गीता माता"  "सत्य के मेरे प्रयोग"  "सप्त महाव्रत" "हिंद स्वराज"  "सुनो विद्यार्थियों" हैं एव   इनके प्रमुख पत्र " इंडियन ओपिनियन" [1903 दक्षिण अफ्रीका  मे] "द ग्रीन पम्पलेट " [1896 राजकोट]   यंग इंडिया[1919], हरिजन [1932] थे |




उनका भारत में सत्याग्रह का प्रथम प्रयास 1917 से चंपारण सत्याग्रह से शुरू होता है , इस सफल सत्याग्रह से प्रभावित होकर रविंद्र नाथ टैगोर ने उन्हें महात्मा की उपाधि  दी|

इसके बाद 1918 में अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन में महात्मा गांधी हिस्सा लेते हैं |

 1918 ई में खेड़ा गुजरात से  महात्मा गांधी ने अपने प्रथम वास्तविक किसान सत्याग्रह शुरू किया 

8 मार्च 1919 को रौलेट एक्ट का विरोध किया और 30 मार्च 1919 को भारत में सर्वत्र सत्याग्रह दिवस मनाया|



 1919 में ही  खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व किया |

1920-22 तक असहयोग आंदोलन शुरू किया तथा 1 वर्ष मे स्वराज हासिल करने का लक्ष्य रखा | इस आंदोलन को चलाने के लिए तिलक स्वराज फंड  स्थापित किया गया जिसमें 6 माह के अंदर 10000000 रुपए एकत्रित हुए  यह भारत का सबसे बड़ा जन आंदोलन था | 5 फरवरी 1922 को चौरी -चोरा कांड होने के कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया |

1930 में दांडी यात्रा के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ हो गया अपने 78 अनुयायियों जिनमे सरोजिनी नायडू भी साथ थी ...  के साथ महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम से 12 मार्च 1936 ईस्वी को दांडी यात्रा प्रारंभ किया 24 दिन के बाद 6 अप्रैल 1930 को लगभग 390  किलोमीटर की यात्रा तय करके महात्मा गांधी ने दांडी में सांकेतिक रूप से नमक कानून तोड़ा |सुभाष चंद्र बोस ने दांडी यात्रा की तुलना नेपोलियन के पेरिस मार्च और मुसोलिनी के रोम मार्च से की | दक्षिण भारत में नमक आंदोलन चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के नेतृत्व में तिरुचिरापल्ली के तंजोर तट हुआ |

 दिसंबर 1731 में महात्मा गांधी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए यस यस राजपूताना नामक जहाज से लंदन पहुंचे, सरोजिनी नायडू ,एनी बेसेंट, मदन मोहन मालवीय भी खुद के  व्यक्तिगत खर्च  पर पहुंचे |5 मार्च 1931 में गांधी इरविन समझौता हुआ इसमें यह हुआ कि सरकार उन सभी बंदियों को रिहा करेगी,जिन  पर मुकदमा नहीं हैं और  राजनीतिक बंदियों पर लगाया जुर्माना समाप्त होगा |

कांग्रेस के कराची अधिवेशन 1931 में इस समझौते की पुष्टि हुई और महात्मा गांधी ने कहा - "गांधी मर सकता है पर गांधीवाद हमेशा रहेगा" 

26 सितंबर 1932 को पूना समझौता होता है जिसके अंतर्गत दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन मंडल समाप्त कर दिया गया |

17 अक्टूबर 1940 को व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू करते हैं प्रथम सत्याग्रह विनोबा भावे तथा द्वितीय सत्याग्रही  पंडित जवाहरलाल नेहरू जी थे 

 7- 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत करते हुए, महात्मा गांधी का अलग ही अवतार नजर आता है |यहां पर "करो या मरो" तथा "अंग्रेजों भारत छोड़ो" का नारा देते हैं| 1942 को आंदोलन शुरू होते ही आपरेशन जीरो आवर के तहत गांधीजी ,मौलाना अब्दुल कलाम आजाद सहित कांग्रेस के सभी नेता गिरफ्तार हो गए| महात्मा गांधी को आगा खान पैलेस में रखा गया जहां उन्होंने21  दिन के उपवास की घोषणा किया |देश की आजादी के समय वे पश्चिम बंगाल के नोवखली  में सांप्रदायिक नेताओं की संधि कराने में जुटे  थे |


22 June 2020

Agricultural Produce & Livestock Market Committee


Agricultural Produce & Livestock Market Committee
STATE APMC ACT
             कृषि राज्य सूची का एक विषय है, इसलिए  कृषि वस्तुओं का वितरण का कार्य राज्य  स्थानीय संस्थाओं के अधीन, संचालित होता है| इन संस्थाओं को APMC  कहा जाता है, इनकी स्थापना STATE APMC ACT के अंतर्गत की जाती है| 
             इन संस्थाओं को लाने के पीछे मुख्य उद्देश्य  यह रहा कि किसानों को उनकी उपज के लिए उचित मूल्य मिले., तथा उनके माल का लेनदेन  एक  नियामकीय  वातावरण के अंतर्गत हो |
          भारत में इन संस्थाओं की  कार्यप्रणाली  कुछ इस प्रकार रही की किसानों के शोषण को अधिक बढ़ावा मिला| और कुछ अन्य समस्याएं भी उत्पन्न हो गई|  जैसे  की खाद्य वस्तुओं की महंगाई, कृषि बाजार का विखंडन , खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए सप्लाई चैन मैनेजमेंट की चुनौतियां आदि| 
STATE APMC ACT से जुड़ी कुछ समस्याएं-

1]यह ऐक्ट इस बात का प्रावधान करता है कि कृषि वस्तुओं का प्रथम विक्रय APMC  मंडियों में ही किया जा सकता है| इस प्रावधान के कारण, एपीएमसी मंडियों को  एकाअधिकारी MONOPOLY  की स्थिति प्राप्त हो जाती है| एकाअधिकारी स्थिति प्राप्त होने से  सुधारों के लिए कोई दबाव नहीं बनता है|
2] यह एक्ट इस बात का प्रावधान करता है कि एपीएमसी मंडियों में, लाइसेंस वाले व्यापारी ही लेन देन कर सकते हैं| इस प्रावधान के कारण  एपीएमसी मंडियों में  कार्य करने वाले व्यापारी , अल्पाअधिकारी {OLIGOPOLISTIC कुछ लोगों का अधिकार}  स्थिति में आ जाते हैं| और कार्टेल बनाकर की कीमतों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं |इससे किसानों को सही मूल्य नहीं मिल पाता है| 
नोट-CARTEL-कुछ एकमत या  एक  राय वाले लोगों का  गैरकानूनी समूह  को कार्टेल कहते हैं|
 लाइसेंस की एक शर्त यह भी है कि , संबंधित व्यक्ति की दुकान मंडी क्षेत्र में हो | इससे नए लोगों का आसानी से प्रवेश नहीं हो पाता है|
       उपर्युक्त के अलावा  लाइसेंस  वस्तु एवं मंडी विशिष्ट होता है..  जैसे अनाज का लाइसेंस अलग लेना है, फल सब्जी का लाइसेंस अलग लेना है|
3]स्टेट एपीएमसी एक्ट  निजी क्षेत्रों को [PRIVATE SSECTOR] मंडियों को स्थापना की  अनुमति  नहीं देता है| इससे प्रतियोगिता का स्तर कम हो जाता है| 
4]यह एक प्रत्यक्ष विपणन [ Direct marketing] को अनुमति नहीं देता है,  इससे बाजार संरचना बिगड़ रही है|
             प्रत्यक्ष विपणन में  उपभोक्ता या क्रेता   सीधे किसानों से माल खरीद सकता है| 
             प्रत्यक्ष विपरण से किसानों को अधिक मूल्य मिलता है, जबकि उपभोक्ताओं को कम मूल्य देना पड़ता है| 
          दक्षिण कोरिया में  कृषि क्षेत्र में  प्रत्यक्ष विपणन के लागू होने के बाद जहां एक और  उपभोक्ताओं को पहले की तुलना में 20-30 % कम कीमत देनी पड़ रही है , तो वहीं दूसरी ओर  किसानों को 10-20% ऊंची कीमत मिल रही है| 
      भारत में किए गए एक अनुसंधान से  यह पता लगता है कि यदि फल और सब्जियों में प्रत्यक्ष वितरण लागू किया जाता है तो किसानों को  उपभोक्ताओं द्वारा दी जाने वाली कीमत का  88  से  95.4% तक भाग मिल सकता है|
5] यह एक संविदा कृषि [contract forming] अनुमति नहीं देता है|
       संविदा कृषि को अनुमति नहीं देने से, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को अच्छी गुणवत्ता का कच्चा माल उचित कीमतों पर पर्याप्त मात्रा में प्राप्त करने में कठिनाई होती है,अर्थात उन्हें सप्लाई चैन मैनेजमेंट की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है|

संविदा कृषि से छोटे खेतों की समस्या का समाधान होता है और किसानों की आय भी सुनिश्चित हो जाती है| 

Agri : Marketing System of India

भारत में कृषि उत्पादकता के कम होने  तथा किसानों की  चिंतनीय स्थिति के लिए के लिए एक बड़ा कारण भारत की विकृत कृषि विपरण प्रणाली भी है , जो एक और किसानों को उनकी उपज के लिए, उचित मूल्य सुनिश्चित नहीं करती है, तो दूसरी और उपभोक्ताओं के लिए, ऊंची कीमत पर खाद्य वस्तुएं उपलब्ध करवाती है|
एक अच्छी कृषि विपरण  प्रणाली की मुख्य विशेषताएं-
 एक अच्छी किसी वितरण प्रणाली में निम्न 3   मुख्य विशेषताएँ होती हैं-

1]प्राथमिक उत्पाद को [किसान] को ऊंची उचित कीमत सुनिश्चित करना|
2] किसानों को प्राप्त होने वाले कीमत तथा उपभोक्ताओं द्वारा दी जाने वाली कीमत में न्यूनतम अंतर सुनिश्चित करना|
3] कृषि वस्तुओं की गुणवत्ता को  प्रभावित किए बिना उपभोक्ताओं का उनके वितरण को सुनिश्चित करना| 
एक अच्छी कृषि वितरण प्रणाली से जुड़ी हुई  मुख्य सुविधाएं या  आवश्यकताएं- 
1]भंडारण क्षमता[storage capacity]
2] माल को लंबे समय के लिए रोक कर रखने की क्षमता [holding capacity]
3] परिवहन[transportation]-पर्याप्त एवं सsta.
4] बाजार संबंधी सूचनाएं[information about market] 
5]  मंडियों की  पर्याप्त संख्या [large no of marke place] 
6] बिचौलियों की न्यूनतम संख्या[ less no.of middleman]
भारत की कृषि विपरण प्रणाली की मुख्य कमजोरियां
1]भंडारण क्षमता में कमी [lack of storage capacity]-
भारत में किसानों के पास भंडारण की पर्याप्त क्षमता नहीं है, इसके अलावा  कई किसान कच्चा भंडारण [ जैसा उत्पादन करते हैं उसी तरह से रख लेते, बिना कोई  कीट नाशी मिलाएं] करते हैं|
2]लंबे समय तक माल को रखने की सुविधा नहीं[ lack of holding capacity]:-
 भारत में 86% किसान सीमांत एवं लघु प्रकार के हैं, उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है, और वे दबाव में आकर अपना माल बेच देते हैं|
3]परिवहन का अभाव[lack of transportation]
भारत में कई गांव रेलवे और अच्छी सड़कों से नहीं जुड़े हैं| इसके अलावा ग्रामीण प्रदेशों में  धीमी गति से चलने वाले वाहनों का प्रयोग होता है|
4] बाजार संबंधित सूचना का अभाव[lack of information about market];-
 शिक्षा की कमी एवं अन्य कारणों से किसानों को बाजार संबंधित सूचनाएं पर्याप्त रूप से नहीं मिल पाती  हैं| 
5] बाजार का अभाव[lack of marcket place]
भारत में औसत  रूप से प्रत्येक गांव पर मंडियों की काफी कमी है| जिससे किसान अपनी अनाजों को मंडी में बेच पाने में असक्षम है|राष्ट्रीय किसान आयोग के अनुसार  प्रत्येक गांव से 5 किलोमीटर की त्रिज्या पर एक मंडी होनी चाहिए| 
6] बिचौलियों की अत्यधिक संख्या[large no. of middleman] 
भारत में कृषि बच्चों के लेन-देन में 5 से 6 व्यापारी या बिचौलिए सम्मिलित रहते हैं, जिसके कारण लाभ का अधिकांश हिस्सा  बिचौलियों के पास चला जाता है| और प्रायः देखा गया है कि किसानों को अपनी फसल की अच्छी कीमत नहीं मिलती और उपभोक्ता को ऊंची कीमत पर फसल मिलती है|
                             उपर्युक्त के अलावा निम्न समस्याओं भी  है- 1]मंडियों में ग्रेडिंग सुविधाओं की कमी|
2] व्यापारियों द्वारा कई प्रकार  से किसानों का शोषण जैसे आढ़त पर कमीशन,तौलाई ,पल्लेदारी,गर्दा [dust] 
3]मंडी प्रशासन द्वारा कई प्रकार के कर  एवं शुल्क | [विपणन शुल्क,  ग्रामीण विकास शुल्क, निराश्रित  शुल्क,क्र्य कर] 
            यदि एक ही मंडी में बार-बार माल बेचा या खरीदा जाता है, या एक ही राज्य की दूसरी मंडियों में माल ले जाया जाता है| तो हर बार विप रण शुल्क  लगाया जाता है, इससे मल्टीपल पॉइंट लेबी आफ  मार्केट फीस [multiple point of levy market fees] कहते हैं

Crop insurence( fasal बीमा)

Need of crop insurence in india 
भारत की कार्यशील जनसंख्या का लगभग 49% भाग, अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है| और भारतीय कृषि का लगभग 60% भाग वर्षा पर निर्भर है| जो सामान्यतया अनिश्चित और  अनियमित रहती है, ऐसी स्थिति में लोगों की आय सामाजिक रूप से सुरक्षित करने की  आवश्यकता को समझा जा सकता है|
          भारत में यह msp और  उसके समानांतर अन्य प्रणालियां  केवल बाजार जोखिम के प्रति  सुरक्षा प्रदान करती है|उनकी आय को सुरक्षित नहीं करती है, यदि प्राकृतिक एवं अन्य कारणों से फसल बर्बाद हो जाती है |तो किसानों को एमएसपी आदि से कोई सुरक्षा नहीं प्राप्त हो पाएगी, और वह ऋण  में के जाल में फंस जाएंगे, जो भारत में किसानों की आत्महत्या का एक प्रमुख कारण है|
 उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि, भारत में फसल बीमा की आवश्यकता बेहद जरूरी है|
WTO भारत एवं कृषि सब्सिडिया 
WTO के अंतर्गत AOA [AGREEMENT ON AGRICULTURE] उत्पाद विशिष्ट  और गैर उत्पाद विशिष्ट  सबसिडियो की उच्चतम सीमा निर्धारित करता है,जो भारत जैसे राष्ट्रों के लिए कृषि गत जीडीपी का 10% है, जबकि जबकि विकसित राष्ट्रों के लिए यह सीमा 5% है| 
                 वर्ष 2013 में भारत के द्वारा nfsa(national food security actराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून) लागू किया गया था, जिसमें जनसंख्या के लगभग 67% भाग को[⅔] ... को एक कानूनी सस्ती दरों पर खाद्यान्नों को उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया |
               अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्रों को यह लगा कि  भारत ‘ पब्लिक  स्टॉक होल्डिंग   आप फूड  grains’  को बढ़ाने की कोशिश करेगा, और इस क्रम में वह 10% की सीमा को  लांघ देगा|
                   वर्ष 2013 के  बाली मंत्री स्तरीय सम्मेलन में  विकसित राष्ट्रों द्वारा इस मुद्दे को उठाया गया,किंतु भारत को  पीस क्लॉज की व्यवस्था के अंतर्गत अस्थाई रूप से, स्थाई व्यवस्था के निर्माण तक 10% के सीमा को पार करने की छूट दे दी गई| भारत को यह कहा गया कि उसके हितों को ध्यान रखते हुए अगले मंत्री स्तरीय सम्मेलन में, स्थाई व्यवस्था का निर्माण कर लिया जाएगा किंतु अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था का निर्माण नहीं हुआ है|
भारत इस विवाद के समाधान के लिए निम्न बातों का प्रस्ताव कर रहा है-
1]यदि ऊंचे एमएसपी के माध्यम से सब्सिडी दी जाती है, उसे ग्रीन बॉक्स सब्सिडी माना जाए| 
2]यदि निर्धन किसानों की आर्थिक सहायता के लिए ऊंची एमएसपी पर खाद्यान्न खरीदे जाते हैं, इस प्रकार से दी जाने वाली सब्सिडी को  AMS  की गणना में शामिल न किया जाए|
3]WTO द्वारा प्रयोग की जा रही ERP[EXTERNAL REFERENCE PRICE ]की वर्तमान आधार वर्ष 1986-87 को बदला जाए|क्योंकि यह बहुत पुराना है|
  विकसित राष्ट्र भारत के इस प्रस्ताव को लेकर सहमत नहीं है, 

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17 May 2020

सब्सिडिया जो भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए अति आवश्यक है वही विवाद का विषय भी हैं

जब सार्वजनिक कल्याण के मकसद से खाद्य उर्वरक, रसोई गैस, मिट्टी का तेल( केरोसिन) आदि को लागत से कम दाम पर बाजार में बेचा जाए और लागत तथा बाजार कीमत के बीच के अंतर की भरपाई सरकार करें तो यह अंतर ही "सब्सिडी" कहलाता है| सब्सिडी योग्यता, आय स्तर , सामाजिक समूह आदि जैसे मानदंडों के आधार पर प्रदान की जाती है| सब्सिडी या भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए अति आवश्यक है जैसे- 1) उर्वरक सब्सिडी उर्वरक प्रयोग को बढ़ावा देती है कृषि उत्पादन में वृद्धि करती है ,साथ ही कुछ किसान उच्च मूल्य पर उर्वरकों की खरीद में सक्षम नहीं है, तो सब्सिडी से उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है| 2) सब्सिडी से अकुशल श्रम बल को रोजगार मिलता है .।कृषि आवश्यकता हेतु मानव पूंजी की उपलब्धता बनी रहती है| 3) कृषि सब्सिडीओं के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है साथ ही उचित भंडारण एवं पैकेजिंग व्यवस्था हेतु सुविधा उपलब्ध कराया जाता है| 4) सब्सिडी बीज वितरण, विपणन कृषि संबंधित प्रौद्योगिकियों, नवीन प्रौद्योगिकियों के क्रियान्वयन एवं प्रशिक्षण पद्धतियों , ऋण हेतु आश्वासन, मशीनों इत्यादि हेतु सहायता प्रदान करती है| इसके साथ ही आपदा प्रबंधन में बढ़ती आबादी के भरण पोषण हेतु फसलों की उपलब्धता को सुनिश्चित एवं संरक्षित करती हैं| फिर भी कुछ ऐसी वजह हैं जिनके कारण कृषि सब्सिडीया विवाद का विषय है - 1)सब्सिडी कृषि उत्पादन में उर्वरकों तथा कीटनाशकों के उपयोग को बढ़ावा देती हैं जिससे मृदा स्वास्थ्य प्रभावित होता है|ICAR( भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) ने फसलों और मिट्टी के आधार पर जैविक उर्वरक विकसित किए हैं जिससे फसल उत्पादन 10 से 20% बढ़ सकता है साथ ही महंगे रसायनिक उर्वरकों के उपयोग में 20 से 25% की कमी भी आ सकती हैं | 2)उच्च कृषि सब्सिडीओं के कारण सरकार कृषि क्षेत्र में पूंजी निर्माण पर पर्याप्त निवेश नहीं कर पा रही है जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार धीमा है| 3) कुछ खास फसलों पर सब्सिडी के कारण लोग उन्हीं फसलों के उत्पादन पर निर्भर हो रहे हैं जिससे क्रॉपिंग पैटर्न पर विपरीत प्रभाव पड़ा है साथ ही खाद्य मुद्रास्फीति का कारण भी बन रहा है| 4)पावर सब्सिडी के कारण भूजल का दोहन बढ़ा है, यदि भूजल का स्तर नीचे जाता है तो इससे ग्रामीण गरीबी भी बढ़ती है 5)सब्सिडीओं के कारण परंपरागत कृषि आगत तो जैसे हरी खाद आदि का उपयोग कम हो रहा है जबकि यह पर्यावरण व पारिस्थितिकी के मित्रवत हैं वहीं दूसरी ओर अंधाधुंध उर्वरक सब्सिडीओं से एनपीके के उपयोग से मृदा के साथ-साथ जलीय इकोसिस्टम को भी क्षति पहुंची है यूट्रोफिकेशन जलीय जीव जंतुओं के लिए जानलेवा साबित होता है जो किसी जलाशय में उर्वरकों के बाहर जाने से ZOOPLANKTONS एवं ALGAE के विकास एवं अधिक ऑक्सीजन उपभोग से उत्पन्न होता है इससे जलीय जंतुओं को ऑक्सीजन नहीं मिलती और उनकी मृत्यु हो जाती है 6) सब्सिडी का भुगतान सार्वजनिक ढंग से किया जाता है भ्रष्ट राजनेता ,नौकरशाह, बिचौलिए निजी हित में इनका अधिकांश भाग इस्तेमाल करते हैं कृषि अर्थव्यवस्था चारा घोटाला उर्वरक घोटाला और निधियों के प्रसरण हेतु चिन्हित की जाती है| 7) कृषि सब्सिडी अधिक कृषि उत्पादन हेतु सीमांत कृषि भूमियों के अतिक्रमण को बढ़ावा देती है जिसका उपयोग जंगलों आर्द्रभूमि यो या अन्य पर्यावरण संरक्षण उद्देश्य हेतु उपयोग किया जाता है सब्सिडी या मिश्रित फसलों के रोपण, पशुपालन मूल्य नियंत्रण जैसे नवाचारी कृषि प्रथाओं की तरफ ध्यान न देने का कारण होती है जरूरत है कि मजबूत बुनियादी ढांचा बनाकर किसान को आत्मनिर्भर बनाया जाए|

16 May 2020

प्रबोधन काल


प्रबोधन का अर्थ-
 पुनर्जागरण कालीन लौकिक चेतना मानवतावाद तार्किक  वैज्ञानिक खोजो को बल देने वाली प्रवृत्ति ने
18वीं शताब्दी में आकर परिपक्वता प्राप्त कर ली |चिंतन की यह परिपक्व अवस्था प्रबोधन के नाम
से जानी जाती हैं|
 विशेषताएं-
1) प्रबोधन कालीन चिंतन ने ज्ञान को विज्ञान से जोड़ा  और कहा कि हमारे लिए सत्य वही है,
जिसका प्रयोग व परीक्षण किया जा सके| वस्तुतः ज्ञान आस्था का विषय नहीं बल्कि तर्क एवं प्रमाण से
युक्त होता है|
2) मध्य युग में यह कहा गया कि सृष्टि ईश्वर द्वारा निर्मित है, उसे मानव द्वारा नहीं जाना जा सकता
अर्थात यह दुनिया मानवी समझ से परे है मध्यकाल में यह सूत्र वाक्य प्रचलित था
कि" जहां ज्ञान का प्रकाश नहीं होता वहां विश्वास की ज्योति से रास्ता दिखाई पड़ता है" इस तरह
मध्यकाल आस्था पर बल देता है|
 प्रबोधन कालीन चिंतन इस मान्यता  का खंडन करता है,एवं प्रयोग एवं परीक्षण
पर बल देते हुए " जानो तब मानो" की बात पर बल देता है|
3) कारण कार्य संबंधों का अध्ययन प्रबोधन के चिंतन का मुख्य तत्व है
वस्तुतः किसी भी घटना के लिए उसकी पूर्व की घटना उत्तरदाई होती है ,
अतः इस कारण को जानना आवश्यक है कि प्राकृतिक शक्तियों से मानव की रक्षा
की जा सके तथा मानव प्रकृति की शक्तियों एवं उसकी उर्जा का रचनात्मक प्रयोग कर सकें|
इतना ही नहीं सामाजिक संबंधों में मौजूद विषमता और उसके कारणों को जानने पर बल दिया गया|
4) प्रबोधन के  चिंतकों ने प्रकृति पर बल देते हुए कहा कि प्रकृति परिपूर्ण है
एवं सौंदर्य से परिपूर्ण है| इसी तरह मानव भी स्वतंत्र हैं किंतु
उस पर अनेक नियंत्रण लगा दिए और वह परतंत्र हो गया है
अतः मानव को प्रकृति की तरफ लौटना चाहिए जहां धर्म जाति एवं नस्ल का बंधन नहीं था| 
6)प्रबोधन के चिंतकों ने देववाद  पर बल दिया इसका तात्पर्य है
कि मानव कर्मकांड से मुक्त होकर आचरण करें इन चिंतकों
ने कहा कि कोई परमसत्ता जो सृष्टि का निर्माण करती है यदि
इस अवधारणा को मान लिया जाए तो इसका तात्पर्य सभी जीवो के
प्रति सहृदयता का व्यवहार करना चाहिए इसी प्रकार चिंतको ने स्पष्ट किया कि
चाहे किसी परम सत्ता ने सृष्टि का निर्माण किया हो किंतु सृष्टि को चलाने के लिए
मानव  पूर्णतया उत्तरदाई है| इस प्रकार चिंतकों ने ज्ञान को विज्ञान से जोड़ने ,
प्रयोग  एवं परीक्षण पर बल देने और कारणो पर बल देने के माध्यम से अनेक वैज्ञानिक
सिद्धांत एवं यंत्रों की खोज को संभव बनाया फलतः मशीनीकरण को बढ़ावा मिला जिसके
कारण भौतिक सुख सुविधाओं में वृद्धि हुई है |मानवतावाद एवं प्रकृति पर बल देते हुए चिंतकों ने
मानव की समता एवं स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया| फलतः  मानवीय मूल्यों को स्वतंत्र मिली |
इस दृष्टि से प्रबोधन कालीन चिंतन मानवीय मूल्यों की स्थापना पर बल देता है|

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