प्रेम-पत्र(२)
हें प्रियतम !
तुमसे अपने प्रेम कों भला कैसे परिभाषित करूं?कुछ चीजों कों व्यक्त
करने के लिए शब्द ही कहाँ बने हैं ?जब भी तुम्हारी आँखों का दीदार होता हैं ,उनमे
छलकता असीमित प्रेम तारों-सितारों और हीरो-मोतियों से भी ज्यादा खूबसूरत ,चमकदार
एहसास देते हैं | आँखे मिलते ही सम्प्रेषण हेतु शब्दों की जरूरत ही नही रहती |चेतना
विलीन हों जाती हैं |याद हैं ,न कल की शाम जब हम –तुम यमुना तट पर फूलो की घाटी
में बैठे थे ,बदरा आयें ,उमड-घुमड़ और बरस
गयें...पता हीं नही चला |चेतना लौटी तो हमने खुद कों भीगा पाया |हम-दोनों कों ऐसा
लगा जैसे गहरे मेडिटेशन या समाधी से उठे हों |शायद राधा-कृष्ण के ऐसे ही अनन्य
प्रेम ने उनकों महान योगी निर्मित किया |
