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3 October 2013

"love letters" / प्रेम-पत्र(२)

                     प्रेम-पत्र(२)

हें प्रियतम !

तुमसे अपने प्रेम कों भला कैसे परिभाषित करूं?कुछ चीजों कों व्यक्त करने के लिए शब्द ही कहाँ बने हैं ?जब भी तुम्हारी आँखों का दीदार होता हैं ,उनमे छलकता असीमित प्रेम तारों-सितारों और हीरो-मोतियों से भी ज्यादा खूबसूरत ,चमकदार एहसास देते हैं | आँखे मिलते ही सम्प्रेषण हेतु शब्दों की जरूरत ही नही रहती |चेतना विलीन हों जाती हैं |याद हैं ,न कल की शाम जब हम –तुम यमुना तट पर फूलो की घाटी में बैठे थे ,बदरा आयें ,उमड-घुमड़ और  बरस गयें...पता हीं नही चला |चेतना लौटी तो हमने खुद कों भीगा पाया |हम-दोनों कों ऐसा लगा जैसे गहरे मेडिटेशन या समाधी से उठे हों |शायद राधा-कृष्ण के ऐसे ही अनन्य प्रेम ने उनकों  महान योगी निर्मित किया |

28 September 2013

love letters प्रेम-पत्र {भाग-१}... "thankyou for your unconditional love"


            हाँ !मैंने तुम्हे प्रेम किया हैं |दिलोजान से तुम्हे चाहा हैं |हों सकता हैं शुरू-शुरू में यह महज आकर्षण से शुरू हुआ हों ,पर अब ,तबसे आज तक शायद ही कोई ऐसा पल हों जब तुम याद न आई हों |वों दिन जब तुम मेरे पास आतीं रहीं ,इसका आभास न था मुझे की एक दिन तुम चली जाओंगी,कुछ ऐसा देकर.....जिसको मैं चुका हीं न सकूंगा |मेरी साँसे जब जब मुझमे आती हैं,तुम्हारी यादें लें आती हैं |तुम्हारी पावन सुवास से मन पुलकित कर  देती हैं|तुम्हारे मन-मंदिर की कर्ण-प्रिय घंटियाँ मेरे कानो में टन-टनाती रहती हैं |ये  दुनिया ,ये जाति-पांति,ये रस्मो-रिवाज हमे क्या समझेंगे ?जब ये खुद का अस्तित्व सच्चे अर्थो में नही समझते |नही तो ये दंगे.ये क्रूरता क्यूँ पनपते ?

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