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20 March 2014

“मर जयिहीं त, का.. का.. साथै लई जयिही” {हिंदी कहानी}


                             

                 गाँव में मथुरा यादव भी मन्दिर बनवा लिए हैं ,पहले छोटई अहीर और लालजी बाभन के मन्दिर थे |रोज ‘८ बजे’ सुबह-शाम घंटा बजता हैं ,भगवान की दया से घंटा काफी बड़ा हैं,उसके बगल में कद्दू को अंदर से खोखला करके हरे रंग की दान पेटिका भी लटकी हैं,जिसमे तेरस और इसी तरह के कुछ त्योहारों पर लोग कुछ पैसे डाल जाते हैं और मन्दिर तो तीन मंजिल का हैं किन्तु ऊपर के दो तो भगवान के हैं तीसरा भक्त यानी मथुरा जी का हैं |इस गाँव के कुर्मी लोग तो दिन भर ताल में मछली ही पकड़ते रहते हैं ,चमरौटी वाले भी कुर्मी बिरादारी की देखी –देखा दिन भर जाल ,कटिया लेकर तारा {तालाब}पर ही बैठे रहते हैं,कुछ लोग राजगिरी या लेबर का काम करते हैं |काफी बड़ा गाँव हैं ,पसियान बिरादरी के लोग सूअर पालते हैं साथ में मजूरी {मजदूरी}करते हैं |अब तो कुछ लोग पढने भी लगे हैं ,लल्लू का चौदह साल तैयारी करके सफदरजंग में MBBS के लिए हो गया हैं ,पसियाने के दो तीन लोग TET भी पास कर  लिए हैं |अब मलहा जैसे लोग भी अपनी बिटिया को मेडिकल की तैयारी कराने लगे हैं |
      मथुरा यादव अद्भुत कैरेक्टर हैं ,प्राईमरी स्कुल के रिटायर्ड मास्टर हैं ...प्राईमरी के पढ़े लोग ही प्राईमरी मास्टर को समझ सकते हैं ,सब उमर वालों से  एक सी भाषा ...सरवा ,सासुरवा ,चमरा ,अहिरा ,ठकुरा,बभना..या और भी जो हम नहीं लिख सकते |दो टीचरो में इतनी मिठास रहती हैं की आपस में मिलेंगे तो भी कम से कम .. एक दुसरे की बहिन गरियाई के | बचपन से ही देख रहे थे की हमारे प्राथमिक विद्यालय के प्रिंसिपल और मथुरा एक दुसरे के गरियाई के बुलाते थे |छुआ-छूत की बीमारी भी प्राईमरी से आज भी दूर हुयी नही दिखती ,हमारे गाँव के स्कूल में बच्चो ने ‘गोली चमार’ के बनाये हुए “मिड डे मील”तक को खाने से इनकार कर  दिया था|
      मथुरा यादव की धाक कई गाँवों के बाजारों तक जमी हुयी हैं ,मास्साब......उनका उपनाम हैं |बाजार के दुकानदारो को उनके मोल-भाव से सौदा देने में पसीने याद आ जाते हैं ,ज्यादातर तो उनसे बचने की भरकस कोशिश करते हैं ,कुछ दुकानदार साफ़ साफ़ मना कर  देते हैं ,सौदा देने से ...|कारण यह हैं की मथुरा उस ज़माने के व्यक्ति हैं  ,जब डीजल ३-४ रूपये लिटर या उससे भी कम आता था ,एक रूपये में बोरा भर गेहूं पिसवाने वाले मथुरा को जब ..आज एक किलो के दो रुपया देना पड़ता हैं ,तो कम से कम बीस बातें उस चक्की वाले को सुनाते हैं |
       मथुरा शादी दो दो बार किये ,पहली शादी में बच्चा नही हुआ तो उस औरत को छोड़ दिए {तलाक}दे दिए ,उन भद्र महिला ने भी दूसरी शादी की,जहाँ भगवान् की दया से उनकी कोख हरी हुयी,उन्होंने सबसे पहले बनने वाले सोठाउरा {बच्चा पैदा होने के बाद जच्चा को खिलाया जाने वाला लड्डू } को मथुरा को भेजा |उनके लाईफ का सबसे कमजोर पोईन्ट बस यही रहा ,की हमेशा मेहरारू से रार रही,दूसरी ले आये,वो भी झगरालू निकली पहले से भी ज्यादा ,ऊपर से तीन बच्चा ले के आई |अक्सर ‘मथुरा महाभारत’ सुनाई पड जाता हैं |जमीन जायदाद किसको देंगे इस विषय में हमेशा,बिटिया-दामाद , स्टेप सन {जो उनकी बीबी को उनसे शादी से पहले का पुत्र था} और मथुरा की ‘मथुरा महाभारत’ गाँव में सुनाई पड़ जाती हैं ,मथुरा अपनी जवानी में बड़े हेकड़ {मजबूत कदकाठी}के व्यक्ति थे ,पचास-साठ रोटी तो बस यूँ ही खा जाते थे,उनका एक ‘स्टेप सन’ होमगार्ड हैं ,जब भी उनको धमकाने{ताकि सारी जायदाद,उसके नाम लिख दें }, थाने से कोई अर्दली लिवा आता हैं तो मथुरा मंदिर में उपर चढ़कर चिलाते हैं “बचावा हो फलाने.. ,भगतवा सार{उनका स्टेप सन} पुलुस लई आई बा”|
             आजकल मथुरा एक अद्भुत {मानसिक}बीमारी से ग्रस्त हैं ,’सोते हुए निर्वस्त्र होकर घूमने’ वाली|कभी हफ्ते में एकाध बार  सुबह तीन,चार...बजे ,तो कभी एक..दो... बजे रात अहिराने या कुर्मियाने से किसी महिला की आवाज आ ही जाती हैं “भाग जा दहिजरुक नाती,नाही त हम..... उपार लेब”|इस  बीमारी से गाँव के एकाध लोग और भी ग्रसित हैं |इसी का परिणाम था की एक बार फूल तोड़ने के लिए सोलह साल की मंजुआ कुनमिन से उनका झगड़ा हुआ ,वो बोली “जेतना पेड़ सेर लगाये अहा,मरे प त लईके जाबा न ,कुल उपार लेब,न रहे फुलवारी न खिले फूल”|बस मथुरा को एक ही अच्छर सुनाई पड़ा “कुल उपार लेब”...और आज तक गाँव की छोकरियन के शब्दों पर सेंसर लगाने की अपील करते हैं |
       मथुरा का मन्दिर बनवाना भगवान् के प्रति अगाध श्रृद्धा थी की नही, पर हर गाँव वाला जानता था ....की यह पडोसी की जमीन पर कब्ज़ा करने की तरकीब हैं|मथुरा हमेशा असुरक्षा से घिरे रहते हैं की कही दयाशंकर प्रधान उनके आठ फुटे मिथाउआ आम से आम तो नाही तोड़ रहे हैं,कही उनकी मेहरारू चोरी चोरी अनाज तो नही बेच रहीं हैं ,कही चोर तो नही आ गये ,रात भर खांसते-खखारते रहते हैं ,कुछ न कुछ हमेशा बनवाते रहते हैं ...गाँव वाले असमंजस में हैं .... “मर जयिहीं त, का.. का.. साथै लई जयिही”  !

5 October 2013

"IPS" अनुराधा ठाकुर !... "against dowery" .

                    
               दिसम्बर मास की उस रविवार को शाम के लगभग ९ बजे का वक्त था ,हमेशा कि भांति OPD अभी खुली थी |इक्का दुक्का …मरीज ,तीमारदार आ जा रहें थे |सिस्टर ने अंतिम पेशेंट बुलाया “इंजी.अनुराधा ठाकुर”!मैं चौंक पड़ा …! “अन्नू को क्या हुआ?”…तभी अनुराधा की बहन सीमा केबिन में दाखिल हुयी “दीदी आई थी ..!बाहर लंबी पंक्ति देखकर आपके घर गयीं हैं ,सिस्टर शीबा से उन्होंने चाबी ले लिया हैं |आप जाओ मैं स्कूटी लायी हूँ , घर चली जाउंगी, दीदी को छोड़ दिजियेंगा”मैंने कहा “कभी नही” ! “IPS अनुराधा ठाकुर ….सैलूट यू सर”! सामने आते ही अटेंशन की मुद्रा में उसने तगड़ा सैल्यूट किया | अन्नू को इस रूप में देखकर मेरे नयनो से  आँसुओ की धार टपक पड़ी ,उसी शालीनता और कृतज्ञता से मैंने भी उसको सैल्यूट किया |मेरी आवाज और लहजे में तेजी आ गयी थी ,मैं खुशी से पागल हों रहा था …इससे पहले होश खोकर गिरता कि …अन्नू ने मुझे बाँहों में भर लिया था”!

18 July 2013

तू मेरी जिंदगी हैं….{कथा लेखन -डॉ. अजय यादव }

हे प्रिये ,

यह सत्य हैं की तुम्हारी आँखों में डूबने के बाद ,बाहरी दुनिया से संपर्क टूट ही जाता हैं |पहली मुलाकात में ही तुमने मुझे कहा था-“आँखे मिलाकर बातें करो” आँखे मिली तो हम लोग एक दूजे कों ही देखते रह गए थे |

तुमसे मिलने के बाद सारी फिजा ही बदल गयी ,दुनिया और खूबसूरत लगने लगी ,रंग चटक हो उठे …प्रकृति प्यारी ,मनभावन सी हो गयी |भीतर कुछ खिल सा गया जिसने मुझमे एक मुकम्मल इंसान क्रियेट किया |तुम्हारे रूप की गंध और नेत्रों की मौन भाषा प्राणों में घुलकर जब फूल जैसी खिली तो आत्मा का संगीत बज उठा हैं , जिससे प्रेम -पंख उड़ने लगते हैं , उस आकाश में , जहां परमात्मा का सातवाँ द्वार है – परम आनंद का ,  “सच्चिदानन्द” का , और वहीँ सत्य , चेतना और आनंद एक होकर सम्पूर्ण श्रृष्टि में बिखरते है ,सूर्य किरण से , यही हमारे पुण्य की पराकाष्ठा है , प्रेम की निष्काम पुण्य-अंजलि”|

तुम अगर बाहर कहीं भी रहती हो तुम्हारी वेल-विशेज की तरंगे मुझे अक्सर रोमांचित कर जाती हैं |कभी कभार मुझे तुम एक छोटी प्यारी सी बच्ची लगती हों जो विना शर्त के प्रेम देती हैं,तुमने प्रेम के बदले ,कभी कुछ नही ,चाहां! … प्रेम भी नही |मैंने तुम्हारे प्रेम कों महसूस किया हैं ,इसकी पवित्रता कों जिया हैं |यह तो तुम्हारा स्वाभाविक गुण ही रहा हैं |मैने रामचरितमानस में पढ़ा हैं –

..उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम।
राम कृपा नहि करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम।।117(ख)।।

{ राम चरित मानस में तुलसी}
शंकर जी पारवती से कहते हैं ; उमा ! ” शुद्ध प्रेम ” ( अनन्य ) से मनुष्य के उपर जैसी कृपा ईश्वर की होती है , वैसी कृपा किसी भी प्रकार के योग ,जप , दान , तपस्या , विभिन्न प्रकार के यज्न /यग्य , व्रत और नियम करने से नहीं होती . ” रामहि केवल प्रेम पियारा : जानि लेहु जो जाननिहारा ” ..

वही = अगर आप समझदार हो तो समझ लो – राम को केवल ” प्रेम ” ही प्रिय है

मैंने फिल्मे देखीं ,मैंने खूबसूरती देखीं फिल्म इंडस्ट्रीज में अपने सौंदर्य के हथियार से जनता के जेब से करोड़ो निकालने वाले ये बनावटी मेअकप भरे चेहरे भी देखे,पर्दे पर इजहारे-मुहब्बत करती अभिनेत्रियां देखी !पर मुहब्बत कों जैसे तुमने व्यक्त किया,विना शब्दों के वैशाखी लिए,शायद उसके लिए माँ सरस्वती ने शब्द ही नही क्रियेट किया होंगा ,वो भी कुछ अनकहा रहने देना चाहती थी | उन नकली चेहरों का सौंदर्य ,बनावटी अपनापन तुम्हारे पैरों के धूल के बराबर भी नही हैं, |हल्के साँवलेपन में तुम्हारा सौंदर्य अलौकिक हैं,उसमे भी जब तुम ‘बड़े हक से’ मेरा हाल पूछती हों,या मेरे अध्ययन के विषयों पर बहस करती हों तो सृष्टि की सबसे खूबसूरत इंसान जान पडती हों |

तुम्हे याद हैं ,मैंने मम्मी से तुमको मिलवाया “मम्मी ने तुमसे बात की ..नाम,पूंछा और …मेरे कान में धीरे से बोली “यह लड़की मुझे बहुत पसंद है”|इस अंतर्जातीय और अलग धर्म में, शादी सम्बन्ध.. कों लेकर समाजिक ठेकेदारों कों हमने मिलकर ठेंगा दिखाया हैं |

तुमसे मिलकर ही हमने सफलता की नई नई परिभाषाये गढ़ी हैं |हर सफलता के पीछे हमेशा तुम्हारा मास्टर प्लान रहा हैं ,मैंने तो सिर्फ उसका क्रियान्वयन भर किया हैं |तुम मुझसे काफी ज्यादा पढ़ी हो और पढ़ने की आदी भी हों |हर असफलता में ,हर दुःख में ,हर दर्द में तुम्हारे कंधे पर सर रख के रोंया हूँ,तुमने हमेशा मुझे सांत्वना के साथ साथ ,हिम्मत दी हैं ..कोई भी सफलता जो मेरी हैं ,वह सिर्फ अकेले मेरी कब रही हैं ,यह सबको पता हैं…..! की हर सफलता पर सबसे ज्यादा कौन खुश होता हैं ….?रात-रात भर अध्ययन कक्ष में चाय का कप कौन पहुंचाता रहा हैं? तुम जैसे तुम्हे हमेशा पता होता हैं की कब मुझे क्या चाहिए ?तुम्हारे अपनेपन और परवाह से कभी कभार मैं खीझ जाता हूँ …सोना नही हैं….? ,थकती नही क्या …..? पर तुम बड़ी गहरी मुस्कान देती हों ,तुम्हारे शांत कोमल चेहरे कों देखकर मुझे बड़ा सकूँन आ जाता हैं |तुम अक्सर कहती हों “हमारा यह जीवन केवल एक बार का है , लेकिन यदि हम एक बार भी ठीक से जीना सीख लें तो एक बार भी बहुत है”.

घर में तुम हमेशा मम्मी की लाडली हों ,लोग समझ ही नही पाते की सास-बहू हैं या माँ-बेटी|मम्मी के प्रशासनिक कार्यों तक उनकी मदद तुम करती नही थकती हों |पापा की तुम इतनी परवाह करती हों की वो हमारी नोकझोक में हमेशा तुम्हारा साथ देते हैं,सच कहूँ मुझे बहुत अच्छा लगता हैं |तुम दुनिया की बेस्ट इमोशनल मैनेजर हों |मेरे खर्चीले स्वभाव के बावजूद हर महीने के अंत तक,तुम्हारे आने के बाद कभी आर्थिक तंगी नही लगी ,जरूरी शापिंग और गैर जरूरी शोपिंग में अंतर करना कोई तुमसे सीखे|बचपन से ही मुझे पैसे मम्मी कों देने की आदत रही हैं ,और जब आज भी अपनी सैलरी मम्मी कों सुपुर्द करता हूँ ,तो तुम्हारे आने से पहले मम्मी कहतीं थी की “तेरे पैसे खुद रख”पर अब मम्मी तुम्हे दे देती हैं,की “घर कों मैनेज घर की लक्ष्मी ही   करेंगी ,अब मुझे तुम्हारे हर कृत्य का आनंद उठाना हैं” मम्मी तुम्हारे आर्थिक मैनेजमेंट की बड़ी मुरीद हैं,शायद इसीलिए तुम ही सबकी सैलरी व इनकम टैक्स तक का हिसाब रखती हों | घर में जब भी कोई फंक्सन होता हैं,मम्मी हमेशा तुम्हे सारी जिम्मेदारियां देती हैं,और तुम “सेंटर आफ अट्रेक्शन” या कार्यक्रम की मुख्य संचालिका होती हों |तुम्हे याद हैं की मम्मी से मैं एक बार लड़ ही पढ़ा था की “मैं तुम्हारा बेटा हूँ …या वों”….मम्मी हसंती रहीं और बोली “वों ! अब जलना छोड़ ! और अपना कर्म कर”,और तुम जानती हों की जब भी मम्मी और तुम्हारा अपनापन देखता हूँ ,तो मुझे बहुत अच्छा लगता हैं |उस दिन तुमने मुझे पीछे से अपनी बाँहों में भरकर कहा था “मम्मी की निगाह में हम दोनों हैं ,जो एक हैं..उनका किसी एक कों भी दिया गया प्रेम या सीख वास्तव में हम दोनों के लिए होता हैं ,हम अलग थोड़े ही हैं”|

तुम हर घर में हो ,मम्मी हर घर में हैं ,पापा हर घर में हैं ,मुझ जैसा भी कोई किरदार हर घर में हैं,आर्थिक स्तर थोड़े ऊँचे –नीचे हो सकता हैं | फिर भी इस समाज में किसी जोड़े कों मारकर पेड़ पर लटका दिया जाता हैं क्यों ?किसी स्त्री कों दहेज के लिए क्यों जलाया जाता हैं ?किसी स्त्री के साथ लैंगिग आधार पर कोई दुर्व्यवहार क्यूँ ?


16 November 2012

रेखा मैडम

इलाहाबाद के यमुना तट पर एक पार्क में मैं बैठा हुवा भविष्य के सपने बुन रहा था ,तभी एक प्लास्टिक की बाल पीठ पर लगी ,जिधर से बाल आई थी उधर मुड़ा तो मैंने एक लगभग ४ वर्षीया छोटी बच्ची को मुस्कुरातें हुए पाया ,कुछ कहता की वो बोली ”भईया मुझे क्षमा कीजिये ,ये बाल मेरी हैं खेलते –खेलते आपको लग गयी ,उस बच्ची का चेहरा उसकी उर्जा बड़ी जानी पहचानी सी लगी…..मैंने कहा “कोई बात नही बाबू !जाओ खेलो !मजे करो “तभी पीछे से आवाज आई “सुरेखा !कहाँ खेल रही हों बेटी…..अब मैं चौक गया ये वही अवाज थी जो स्कूल के दिनो में हमारी पसंदीदा आवाज थी ,मुड़ा तो सामने रेखा मैडम के पति थे |
मैं गाँव से पहली बार कसबे के इस स्कूल में आया था .हालाँकि इलाहाबाद में उस समय के पी कालेज,सी ए वी इंटर कालेज ,जी आई सी इन्टर कालेजो का जलवा था ,किन्तु नैनी एक औद्योगिक क्षेत्र था ,और हमारे बड़े भाई यही की एक फैक्ट्री रेमंड में आपरेटर थे इसलिए उन्होंने घर के नजदीकी स्कूल को वरीयता दी|गाव में कभी लड़कियों के स्कूल में नही पढ़ा था और ये पब्लिक स्कूल था ,,  जहां…. को-एजुकेशन की व्यवस्था थी ,इसलिए मैं बहुत शर्मिला हों गया था |यहाँ आने से पहले ११वी की पुस्तकों को एक बार पढ़ लिया था इसलिए मेरी गिनती होनहारो में की जाने लगी ,कुछ ही दिनों में मैं कालेज में हीरो हों गया और अभिमानी भी .. ,किस लड़की का घर किस गली में पड़ता हैं ,कौन लड़की कौन से कोचिंग में पढ़ती हैं इन सब के बारे में समस्त जानकारियों का श्रोत मैं ही था ,यहाँ तक की कुछ नवजवान शिक्षक भी इन जानकारियो को मुझसे लेते रहते थे|उन्ही दिनों हिन्दी के अध्यापक का कहीं डिग्री कालेज में चयन हों गया ,बाद में स्कूल का प्रबंधन एक अध्यापिका खोज कर लाया वो थी –रेखा मैडम |
क्लास में आईं तो सब लडके अपलक उन्हें देखते ही रह गए,२४-२५ वर्षीया तीखे-नैन नक्स की युवती थीं वे |इस उम्र में विहारी के दोहे पढते पढते कहीं ना कहीं श्रृंगार रस हमारे मनो में प्रधान रूप ले चुका था |करीने से साड़ी में लिपटी सांवलेपन में इतनी खूबसूरती हमने पहली बार ही देखी थी |हम सभी उनकी उर्जा से ,उनके अपनेपन से ,उनके स्नेह में बंध गए थे|यह उस उम्र का प्रभाव था ,हमारी नजरे अक्सर उनके चेहरे पर से आकर उनके वक्षों पर टिक जाती थी, और अक्सर हम लोग खुद ही शर्मा जातें थे |लड़कियां तो हमेशा उन पर फ़िदा रहती थी |आस-पास मडराती रहती थी |पढाने में इतनी उर्जा की शब्द सीधे दिमाग में ही घुस जाते थे और रेखा मैम मेरे दिमाग से दिल में घुस रहीं थी |इन्ही दिनों क्लास में सभी लडको ने मेरे नाम से एक लड़की रूचि शुक्ला को चिढ़ाना शुरू कर दिया था ,जिसमे मैं भी कभी कभार दिलचस्पी लिया करता था |[कालेज की भाषा में टाईम पास ],आखिरकार वेचारी रूचि ने एक दिन कालेज की परम्परा को कायम रखते हुए लव लेटर लिखा |और मेरे घर की खिडकी में[जों उसके रस्ते में थी ] डाल ही दिया ,जों नावेल पढ़ रहें मेरे पापा के गोंद में गिरी,पापा कुछ बोले नही ,बस ध्यान से क्लास में पढ़ने को बोल दिया ,उनको मुझपर बहुत यकीं/विश्वास था की मैं कुमार्ग पर नही चलूँगा |उस लेटर को मैंने हिन्दी की किताब में रख दिया जों एक दिन रेखा मैम के हाथ लग गयी –मैम कुछ नही बोली,अपने केबिन में बुलाईं और बस इतना कहाँ की अभी तुम दोनों की उम्र पढ़ने की हैं ,अजय पहले कुछ बन जाओ ,फिर इस तरफ ध्यान लाना और उन्होंने जों कहा उसे मैं अपने ही शब्दों में व्यक्त करता हूँ
“प्रेम कभी हमारे बाहर नहीं होता ,यह हमारे भीतर होता है ,"किसी को पाना है "सिर्फ इसीलिए रिश्ते ना बनायें,समझौता ना करे ,अपने मानदंड स्थापित करें" |
   इसके बाद उन्होंने वशी शाह की कुछ पंक्तियाँ सुनाई-

“मुहब्बत अखिरिश है क्या ? वसी ! मैं हंस के कहता हूँ – 
किसी प्यासे को अपने हिस्से का पानी पिलाना भी ..मुहब्बत है ! भंवर मे डूबते को साहिल तक लाना भी ..मुहब्बत है ! किसी के वास्ते नन्ही सी क़ुरबानी .मुहब्बत है ! कहीं हम राज़ सारे खोल सकते हों मगर फिर भी ,
किसी की बेबसी को देख कर खामोश होजाना भी …मुहब्बत है !
हो दिल मे दर्द , वीरानी मगर फिर भी
किसी के वास्ते जबरन ही मुस्कराना भिओ मुहब्बत है !
कहीं बारिश मे भीगते बिल्ली के बच्चे को
ज़रा सी देर को घर में ले आना , भी मुहब्बत है !
कोई चिडया जो कमरे में भटकती आ गयी हो
उस को पंखा बंद कर , रास्ता बाहर का दिखलाना ,मुहब्बत है !
किसी का ज़ख़्म सहलाना , किसी के दिल को बहलाना ..मुहब्बत है !
मीठा बोल , मीठी बात , मीठे लब्ज़ सब क्या है ?मुहब्बत है !
मुहब्बत एक ही बस एक ही इंसान की खातिरमगन रहना , कब है ?
मुहब्बत के हजारों रंग , लाखों रूप हैंकिसी भी रंग में ,
हो जो हमें अपना बनती है,ये मेरे दिल को भाती है"……….

उनका ढंग सकारात्मकता और हिन्दी पढाने से ….मैं हमेशा प्रभावित रहां |उनको भी कवितायें लिखने का शौक था |हमेशा हर चीज/माहौल के सही रूप/चीज को देखने की आदत हमे उनसे ही मिली थी ,उनका उद्देश्य हम सभी की उर्जा को सकारात्मक दिशा में लगवाना था ,इसलिए वे लगभग रोजाना हम सबसे पूछती थी”आप क्या बनना चाहतें हों?’सबके उत्तर अलग अलग हुवा करते थे,ज्यादातर तो कह ही देते थे की मैम मुझे कुछ नही बनना हैं ,हद तो तब हों गयी जब एक लड़का बोला की “मैम आपई बतावा हम का बन जाई?”.उनके मापदंड ही अलग हुआ करते थे हर चीज को मापने के अक्सर वे किसी कम कम पाने वाले स्टूडेंट के पास जाती और उसका हौंसला अफजाई करती रहती थी,वे अक्सर कहती थी की “किसी के कम अंको से ही उसकी प्रतिभा का मूल्यांकन नही किया जा सकता” |
बच्चों से रेखा मैम का स्नेह हमेशा स्पष्ट रहता था |संक्षेप में यह छात्रों में उच्च आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की भावनाएं स्थापित करने के लिए था ,वे हमेशा हर एक को जबरदस्त महसूस कराती थी ,और उनका तकिया कलाम था “आप में अनंत क्षमताएं हैं” उन्होंने अपने वाक्-पटुता से सिद्धह भी किया की हम ईश्वर के छोटे अंश हैं “|मुझे याद आते हैं वे लम्हे जब उन्होंने मुझसे पूछा –उर्जा संरक्षण का नियम बताओ ?मैंने कहा”उर्जा को ना तो उत्पन्न कर सकते हैं ,ना ही नष्ट कर सकते हैं .बल्कि एक रूप से दूसरे रूप में बदल सकते हैं “|“यानी उर्जा थी… हैं…. और रहेंगी किसी ना किसी रूप में” उन्होंने कहा!मैंने और छात्रों ने उनसे सहमती जताई ,फिर उन्होंने एक चंदनधारी ब्रह्मिन छात्र से पूछा “ईश्वर क्या हैं ,उसके आस्तित्व पर प्रकाश डालो “?उसने कहाँ “ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं ,वह हमेशा से था …हैं…. और रहेंगा” |तब मैम ने कहा “इसका मतलब हैं ,ईश्वर उर्जा हैं ,सकारात्मक उर्जा |जों हम सब में हैं |जिस प्रकार से ईश्वर ने सृष्टि की रचना की उसी तरह हम भी अपनी सृष्टि [करियर ,पढ़ाई ,सम्बन्ध ]निर्मित कर सकते हैं हम सब इंसान के रूप में ईश्वर हैं जिनमे कोई कमी नही” |
वे हमेशा बच्चों के अच्छे कार्यों के लिए उनको प्रोत्साहित करती थी ,उनका मानना था की प्रशंसा से बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता हैं |प्रशंसा से आत्म छवि बेहतर बनती हैं |प्रशंसा से वह खुद पर भरोसा करने लगता हैं और इससे उसे ज्यादा बड़ी और बेहतर चीजे करने का आत्मविश्वास मिलता हैं |
रेखा मैम ! मेरे ख्याल से तब के प्राईवेट स्कूलों के रेट के आधार पर १५००/१००० पातीं रही होंगी अक्सर कहती थी”धन एक साधन हैं,जिससे आप अपने जीवन की प्रिय चीज प् सकतें हैं |प्रेम की आकर्षण शक्ति के पास आपकी मनचाही चीज आप तक पहुचने के अनगिनत तरीके हैं :पैसा भी उनमे से एक हैं”|बिल चुकाते समय ,कहीं अपना पैसा खर्च करते समय हमेशा वह खुशी महसूस करती थीं |रेखा मैम कहती थी “जब कहीं से आपके हांथो में कुछ पैसा आयें ,तो कृतग्य हों,चाहे यह पैसा कितना ही कम क्यूँ ना हों !याद रखें,कृतज्ञता अच्छी चीजों को कई गुणा बढ़ा देती हैं”
बाहरी संसार की परिस्थितियों को बदलने की कोशिश में जमीं आसमान एक करने की तुलना में अपने एहसास को बदलना ज्यादा आसान हैं |भावनाओं को बदलतें ही बाहरी परिस्थितियाँ अपने आप बदल जातीं हैं |जिस व्यक्ति को जों देते हैं वही वापस पातें हैं |अक्सर प्रधानाचार्य शिकायत करतें थे आप बच्चों को डाटती नही हैं ,तो वे कहती थीं -दयालुता ,प्रोत्साहन ,सहयोग कृतज्ञता या किसी भी अच्छी भावना के माध्यम से प्रेम दिया जाता हैं तो यह लौटकर वापस आता हैं “सच बात हैं जैसे ही रेखा मैम आतीं थी क्लास में ऐसा लगता था जैसे सकारात्मक उर्जा फ़ैल जाती थी ,वे हम लोगों को सीमित करने वाले दायरो से ऊँचा उठाना चाहती थीं |अक्सर उत्साह वर्धन करती थी ,वे हर क्षेत्र की सर्वोच्च चीजों के बारें में सोचतीं थी और हमे भी यही सुझाती थी |
            वे कहतीं थी की हम लोगों को अपना ध्यान उसपर रखना हैं जों हमे पाना हैं ,हमारा हर विचार उर्जा लिए होता हैं यदि हम पूरे दिल से वह विचार अपना लेते हैं तो वह विचार हमे अपना लेता हैं ,और हमारी जिंदगी की हकीकत में बदल देता था |
                     हमारे कालेज में सभी धर्म /जाति के बच्चे आतें थे वे कहतीं थी
जैसे मै अपने धर्म में परिवर्तन नही चाहती हूँ , उसी तरह किसी ईसाई , पारसी , यहूदी और मुसलमान को उसका धर्म बदलने को न कहूँ , न राय दूँ अथवा न चाहूं । सभी धर्मों में कुछ कमी हो सकती है या है ; परन्तु जैसे मै अपने धर्म में पक्की हूँ वैसे ही सभी धर्म के लोग अपने में पक्के बने रहें । यही मेरे अनुसार धर्म के समझ का सार है । 
मै चाहती हूँ कि सभी धर्म के लोग यही प्रार्थना करें कि यदि वे हिंदू हैं तो और अच्छे हिंदू बन सकें ; अगर मुस्लमान हैं तो और बेहतर / अच्छे मुस्लमान बनें और इसी तरह और बेहतर / अच्छे ईसाई , पारसी आदि आदि बनें । 
            सभी धर्मों में वही कहा गया है जो मनुष्य के हित में हो और जिससे हम प्रेम , करुणा , अहिंसा , भाईचारा , एकता विश्वबंधुत्व और विश्व शान्ति की स्थापना कर सकें । जो अपने धर्म को ठीक से समझ लेता है वह निश्चित ही दूसरे धर्मों का आदर करेगा । ” जब हम अच्छा करते हैं तो हमें अच्छा अनुभव होता है और जब हम कुछ बुरा करते हैं तो हमें बुरा अनुभव होता है ; यही मेरा धर्म है ” – अब्राहम लिंकन । और – ” जब हम अच्छाई और सच्चाई के साथ अपनी आत्मा के साथ जीवन बिताते होते हैं तो वही हमारा धर्म होता है ” – एलबर्ट आइन्स्टीन ।
                    रेखा मैम को प्यार हों गया था |बहुत खुश रहती थी !…हम लोगों को अक्सर उस व्यक्ति से ईर्ष्या होती थी जों उनको ले जाने की कामना रखता था |अब उनके चेहरे पर ज्यादा चमक रहती थी |लगातार हम लोग क्लास में उनका इन्तेज़ार करतें और चाहते की हर क्लास उन्ही की हों …
                   अब कक्षा में, बिहारी की दोहों में रंगबिरंगे सपने दिखतें थे ,और उन रंग-बिरंगे सपनो को हम कल्पना में देख भी लिया करतें थे |एक धर्मशास्त्री का कथन हैं-“जैसे-जैसे आपके भीतर प्रेम बढ़ता हैं ,सुंदरता भी बढ़ती हैं |क्यूंकि प्रेम ही आत्मा का सौंदर्य हैं “|उसी समय हिन्दी में एक रूपक पढ़ा था”तुम्हारे रूप की गंध और नेत्रों की मौन भाषा प्राणों में घुलकर जब फूल जैसी खिलती है तो आत्मा का संगीत उठता है , जिससे प्रेम -पंख उड़ने लगते हैं , उस आकाश में , जहां परमात्मा का सातवाँ द्वार है – परम आनंद का , ” सच्चिदानन्द ” का , और वहीँ सत्य , चेतना और आनंद एक होकर सम्पूर्ण श्रृष्टि में बिखरते है ,सूर्य किरण से , यही हमारे पुण्य की पराकाष्ठा है , प्रेम की निष्काम पुण्य-अंजलि “
                   उन्ही दौरान हम लोगों ने हिन्दी की एक पैरोडी कहीं से लिखी थी |पर चाहकर भी उनको सुना नही पाया लीजिए आज आपको सुना रहां हूँ –
“हिन्दी की क्लास थी , टीचर उदास थी |पति से थी लड़कर आई , 


        अब काहे की पढ़ाई |बच्चों ने कहाँ टीचर पढाओ ,        
 टीचर ने कहा मेरा सिर मत खाओ |
 पिछली बार गाय पर निबंध लिखा था,           
इस बार पति पर निबंध लिख लाओ |
 यूँ तो पति का नाम सुनकर हर बच्चा घबराया ..
       किन्तु एक जीनियस चश्मिश कुछ यूँ लिख कर लाया —–
“पति एक दीन असहाय,आज्ञाकारी पशु हैं जों कुछ कुछ इंसानों जैसा होता हैं |वह पत्नियो का पालतू होता हैं |आकडो के अनुसार पिछले वर्षों में पालतू पशुओ की संख्या बढ़ी हैं |पत्नियाँ हमेशा इस जीव को पगहे में बाँध कर रखती हैं ,और सिर से खतरे का लाल सिग्नल देती हैं क्यूंकि इस जीव को बाहर मुह –मारने की आदत होती हैं |
वर्तमान समय में पतियों की २ नसले पायी जा रहीं हैं –
१]जोरू का गुलाम
जोरु का गुलाम :-पिछले कई वर्षों से इस प्रजाति के पति बढ़े हैं ,जिसके फलस्वरूप वृध्हा आश्रमो ,और बुजुर्गो पर अत्याचार भी बढ़े हैं |
२]जोरू का बादशाह-इस प्रजाति के पति विलुप्ति के कगार पर हैं ,सरकार को नयें “बादशाह बचाओ केन्द्र” खोलने की जरूरत हैं ,इन्ही प्रजातियो ने ने ही संयुक्त परिवार और घर के वृध्हो को भगवान का दर्जा दे रखा हैं ..जिसके कारण अपनी ही मन मस्तिष्क में कुंठा जन्म देके इनकी पत्नियां अक्सर वीमार ही रहती हैं “
                   आखिर वो दिन आ ही गया जब रेखा मैम की शादी थी !शहनाई और आर्केस्ट्रा की धुनें बज रही थी क्लास के कुछ चुनिन्दा लड़के आमंत्रित थे ,मन में अजीब सा दर्द था पता नही उनसे बिछुड़ने का या कुछ और…बस उनकी शादी में इधर उधर हम लोग भागतें रहे ….शामिल रहे ,मजे करते रहें …विदाई के वक्त ऐसा रुदन-क्रन्दन हुवा की दुल्हे राजा भी रोये बिना ना रह सके…..गाडी उनके पिया घर की तरफ बढ़ चली और हमारे आँखों से आंशुओ की मोटी धारें भीं….गाडी सहसा १०० मित्र जाकर रुकी ,और फिर उनके पति ने बुलाया “अजय !इधर आईये ,मैं गया तो देखा मैम बुला रहीं थी “बोली !बेटा तुमसे मुझे बहुत आशाएं हैं”उनका कथन और इस आवाज की टोन आज भी मेरे कानो में गूजती हैं ,जिसके कारण मैं कामचोरी और आलस्य को त्याग कर पाने में सफल हुवा ,जब भी मैं कोई निरर्थक कार्य करता हूँ तो वही आवाज आज भी मेरे कानो में गुजती हैं |वक्त बीतता गया मैंने सुना की मैम इलाहाबाद की किसी गाँव में सास के साथ  ज्यादातर रहतीं थी ,पर अपने पति के पास हर सप्ताह आती हैं |एक दिन उनके देवर से मुलाकात हुयी उनसे मिलने की इच्छा की ,तो वह बताया की मैम प्रेग्नेंट हैं,शनिवार को शहर आएँगी |बहुत खुश हुए अब तक  हम मेडिकल की तैयारी में लग गए थें |
                        पहली डिलीवरी थी सो एहतियात बरतते हुए उनके पति ने उन्हें शहर के ही एक हास्पिटल में उनको भर्ती करा दिया |यह वही शहर था जहां वे गाँव की एक सिम्पल लड़की से रेखा मैम बनी थीं |यहाँ की गलियाँ ,पक्षी,पशु मनुष्य सभी से मैम का एक खास रिश्ता था |मैम को देखने इतने लोग आते थे की वहाँ का स्टाफ उन्हें सेलेब्रिटी समझता था |मिलने वाले इतना फल लातें थे की मैम के पति उन फलो को बैगो में भरकर ले जाया करते थे |जैसे जैसे उनकी डिलीवरी का वक्त नजदीक आ रहा था,हास्पिटल प्रबंधन सावधानी बरतते हुए मिलने वालो पर रोक लगा दिया |वेटिंग रूम हमेशा भरा रहता था | आखिर डाक्टरों ने २४ घंटे का एक्सपेक्टेड समय दे ही दिया,मुझे याद पढ़ता हैं कम से कम ४० उनके पढाये छात्र वहाँ जम गए ……रात को २ बजे इमेरजेंसी में डॉ को जगाया गया और आपरेशन से बच्चा होना था …….खून की जरूरत आ पड़ी ……इस वक्त हर कोई बहुत उत्तेजित था |हर कोई खून देना चाहता था …अंत में मेरा ब्लड ग्रुप मैच किया और मेरे तीन और साथियो का भी …हमने रक्त दिया ,हमारे दिल को राहत मिली |किन्तु सुबह के ५:४५ पर डॉ ने कहा “she is no more”|
ये सबसे बड़े दुःख का दिन था |सुबह के ६ बजे तक सैकड़ों छात्र एकत्रित हों चुके थे |
सभी लोग बहुत दुखी थे |दुखीं मन से हम लोग उनके अन्त्येस्थी में शामिल हुए ,वे तो चली गयीं किन्तु उनके शब्द गुन्ज्तें रह गए “बेटा ,मुझे तुमसे बहुत आशाएं हैं”!मैंने संकल्प किया की चाहे जों कुछ हों जाय मैं डॉ बनूँगा !और ऐसा डॉ बनूँगा जिसके दिल में इंसानियत /आदमियत हों , सिर्फ डिग्री लेना हिन्  नही दक्षता प्राप्त करना मेरा उद्देश्य बन गया ,ac में नही सुदूर ग्रामांचल में झोपड़े के नीचे भी अपने देश की लोगों के साथ   सोना  ,और रात भर जाग जाग कर बुनियादी सुविधाए उपलब्ध करना मेरा लक्ष्य बन गया|आज ४ साल बाद अचानक इस मुलाकात से उत्तेजित सुरेखा के पापा ने {मैम के पति] जिद किया की हम उनके घर चले |हम गयें ,जहां वे रहते थे |रेखा मैम !वहाँ की हर दीवार में जिन्दा थी .ऐसे लगता था जैसे पुकार उठेंगी “तुम आ गए”| वही इत्र की खुसबू ,मैम की पसंद के रंग के पर्दे, करीने से रखी उनकी चप्पले,आलमारी में रखी उनकी वही किताबे जों हमे पढ़ाया करती थी !अब आंसू नही रुके! उनके कमरे की साफ सुथरी चमकती एक एक चीज देखकर मैंने सोचा क्या कोई किसी को इतना प्यार कर सकता हैं ??की उसके मरने के बाद भी पागलो की तरह उसे चाहे ?यही बात मैंने सुरेखा के पापा से पूछी तो वे बोले “रेखा जी !मेरे मरने से पहले मुझसे नही अलग हों सकती “!
कुछ तो हैं प्रेम में वरना सीरी –फरहान ,लैला मजनू ना जाने कितने अफ़साने कैसे बनते ,इतनी पवित्र जज्बातों भरी  मुहब्बत ,बिना शर्तों काअसीम  प्रेम ...मेरी कल्पना से परे था !

मुहब्बत एक खुशबु है हमेशा साथ चलती है 
कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता 
[-बशीर बद्र]
लेखन -अजय यादव 

3 November 2012

"उल्फत के लहूँ "

शरद पूर्णिमा की उस निःशब्द शान्ति में मैं उस गाँव की पगडंडी पर बढ़ता चला जा रहा था |दूर सुदूर से कुत्तों के भौकने की आवाजे ,सियारो के रोने की आवाजो का एक प्रवाह सा आता और फिर शांत हों जाता ,गाँव कि इस पगडंडीनुमा सड़क पर एक जीर्णशीर्ण पुलिया हैं ,जिससे सटा जामुन का एक विशालकाय वृक्ष हैं ,मैं उसी पुलिया पर वृक्ष से टेक लगाकर बैठ गया ...और गहरे विषाद कि स्थिति में आँखों के सामने अँधेरा सा छा चुका हैं |स्नेहा से मेरी मुलाकात दिल्ली के एक बड़े सरकारी अस्पताल में हुयी थी वह अपनी हृदयरोगी माँ के साथसाथ,जों कि मेरी पेशेंट थी ,आतीं थी ,मूलतः विहार के पटना कि निवासी थी और दिल्ली NIT में अभियांत्रिकी से स्नातक थीं |
शनिवार कि उस सुबह मेरी ड्यूटी फेमस CARDIOLOGIST,सीनियर रेजिडेंट और मेरी शिक्षिका डॉ इंदिरा जी के साथ थी |हमेशा कि तरह OPD फुल थी ,केस स्टडी की फाईल आतीं ,रोगी आता ....फिर नेक्स्ट ..|१९वे नम्बर पर मिसेज सिंहा थी ,और उनके साथ उनकी सुपुत्री स्नेहा सिन्हा भी थी |यह हमारी पहली मुलाकात थी ,स्नेहा कुछ बोल रहीं थी ,उसकी लबो की जुंबिश और उफक से नूर भरे चेहरे ने कुछ क्षण के लिए वक्त थाम सा दिया था ,आवाजे कुछ पलों के लिए सुनाई देनी बंद हों गयी | “डॉ साहेब” ....इंदिरा मैम की कड़क आवाज में मैं कुर्सी से उठ गया “यस मैम” !सब हंस पड़े |
रविवार की उस शाम अपने रोजमर्रा के कार्यों को निपटा कर मैं दिल्ली की गलियो में घूमने निकल पड़ा ,किसी शहर में जहां आप नये हों ,कितना अच्छा लगता हैं स्वछन्द विचरण करना |मैं आज अपने भीतर से हृदय रोग उत्पन्न होने के संभावित कारणों की तलाश में निकला था ………………….
हमारा दिल प्रेम का प्रतिनिधि हैं और रक्त खुशी का |दिल प्यार से हमारे शरीर में खुशी भरता हैं ,जब हम खुशी और प्यार को अपनाने से इनकार कर देते हैं तो हृदय सिकुड़ जाता हैं ,और ठंडा हों जाता हैं इसकी वजह से रक्त धीमा हों जाता हैं और लोग एनीमिया ,एन्जिना ,और हृदयाघात की ओर बढ़ने लगते हैं |
दोस्तों !जीवन बहुत आसान हैं ,हमे करना ५ काम चाहिये पर करते २५ हैं ,हम अपने ही द्वारा उत्पन्न किये हुए सोप ओपेरा और नाटकों में इतने उलझ जाते हैं की अक्सर उन छोटी छोटी खुशियों पर ध्यान देना भूल जातें हैं जों हमारे आस-पास होतीं हैं |हम बरसो तक अपने दिल से सारी खुशियों को निचोड़ते रहते हैं |जिससे अंत में वह पीड़ा से कराहने लगता हैं |मेरी सीनियर सर्जन बॉस अक्सर कहतीं हैं “जिन लोगों में हृदयाघात होता हैं ,वो कभी खुश नही रहते ....यदि वो समय रहते जीवन की खुशियो को अपना नही लेते तो उन्हें दूसरा हृदयाघात हों सकता हैं” |इन्ही ख्यालो में गुम चला जा रहां था,….. तभी मेरे सामने सरपट भागती एक स्कूटी अचानक से रुकी ,हेलमेट का काला शीशा उठा और स्नेहा सिन्हा की मधुर आवाज भी “हों डाक्टर बाबू .....जी ,कहाँ घुमत बटला.”..शुद्ध बिहारन शैली ,दिल बाग बाग हों गया और आवाज नही निकली |”आवा साहेब ,हमारा घर पास हिन् हैं ,मम्मी आपसे मिलकर बहुत खुश होंगी ..” मैं उनकी स्कूटी पर बैठ गया .उनकी शीरीं आवाज की प्रतिध्वनिया बार बार मेरे कर्णपटलो पर गूंज जातें ,मैं उनके साथ होने के एह्सांसो में ही खो जाना चाहता था ,हवाओं की सरसराहट और दिल की धडकन के सिवा चेतन रूप से मैं कुछ भी नही सुन रहां था |
अभिवाद्नोपरांत मिसेज सिन्हा ने कृतज्ञता भरे स्वरों में अपने पति से परिचय कराया “यही कार्डियो सर्जन हैं जिनकी कृपा से हैं आप सबके साथ हूँ”! “वोह डॉ साहेब !इस खाकसार को विशाल सिन्हा कहते हैं ,वरिष्ठ PPS OFFICER ,बिहार पुलिस” | फिर उन्होंने अपनी दबंगई के किस्से शुरू किये जों एक मुझ जैसे डॉ के लिए बकवासथी ,बातों बातों में उन्होंने पूंछा “आप कहाँ के रहने वाले हैं “ मैंने कहा “इलाहाबाद” यू पी .................भाई मैं भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का पढ़ा हूँ ..वे बात काट कर बोले “ये इलाहाबाद यूनिवर्सिटी हैं ना . अपने LOGO में लिखा .”क्वाट रामी टाट”{एक वृक्ष अनेक[हज़ार ]शाखाए }की कहावत को चरितार्थ करतीं हैं ,..मैं पूरे भारत में जहां कहीं गया हूँ ,जिन भी वरिष्ठ शिक्षकों ,बुद्धजीवियो,और नौकरशाहों से मिला हूँ ७५%से ज्यादा तो इलाहाबाद की उपजाऊँ भूमि की उपज हैं .... मैंने उनकी सहमती में सिर हिलाया बात तो सहीं ही कह रहे थे |फिर कटरा की गलियों ,नेतराम की मिठाईयां ,संगम ,आनंद भवन ,होस्टलो के चर्चे इन सबसे से खालिस इलाहाबाद माहौल तैयार हों गया |तीन घंटे कब बीत गए पता हिन् नही चला ,मैंने अनुमति मांगी तो बोले डॉ साहेब डिनर करके ही जाईये ...मिसेज सिन्हा के आग्रह को मैंने मान लिया,उनमे मेरी माँ जैसी आज्ञा झलक रहीं थी |
भारत की राजधानी दिल्ली में मिट्टीके बर्तनों में पकी दाल,चावल और मिट्टीके तवें पर सिकी रोटी की शायद आप कल्पना नही कर सकतें ....शायद यह दाल मेरे जीवन की खायी गयी सबसे स्वादिष्ट दाल थी | मिसेज सिन्हा मेरे विचारों को भांप चुकी थी वो बोली “मिट्टी ऊष्मा की कुचालक हैं ,इसमें भोजन धीरे धीरे गर्म होता हैं और सभी MICRONUTRIENTS धीरे धीरे भोजन में आ जातें हैं |ये निरापद और पौष्टिक भोजन हैं ...मैंने कहाँ ये रोटी बड़ी स्वादिष्ट हैं .मिसेज सिन्हा बोली “इस रोटी में गेहूं का आटा ,सत्तू,चने का बेशन ,एक छोटा चम्मच अश्वगंधा मिला हैं,अच्छा डॉ साहेब…! आपकी शादी हुयी की नही ?मेरा चेहरा सुर्ख लाल हों गया मैंने कहाँ “नही”!डॉ साहब शर्माते बहुत हैं कह कर मिस्टर सिन्हा हंस पड़े| भोजनोपरांत मिस्टर सिन्हा ने अपने फरजंद{पुत्र} को बुलाया “डॉ साहेब को इनके होस्पिटल तक छोड़ आओ”...मैं हॉस्पिटल लौट आया |
न जाने कितने दिनों बाद माँ के हांथो पके भोजन जैसा भोजन किया था |इस परिवार के उस दिन किये गए आतिथ्य सत्कार ने मेरे हृदय में उनका स्थान बना दिया था |OPD में अक्सर मैं मिसेज सिन्हा को ज्यादा वक्त देता, ARTIOSCLEROSIS के सिवा उनकी सब समस्याएँ दूर हों गयी थी,ARTIOSCLEROSIS के संभावित कारणों में “प्रतिरोध,तनाव ,सख्त संकीर्णता ,उत्तम को देखने से इनकार करना होता हैं”|
स्नेहा सिन्हा से बातों बातों में ही मोबाईल नम्बर मांग लिया था ,मैंने उनसे २० मिनट बात करने की अनुमति चाही और मिसेज सिन्हाको पूरी तरह ठीक करने के लिए उसकी हेल्प मांगी |मिसेज सिन्हाकी मानसिक प्रोग्रामिंग स्नेहा की मदद से मैंने काफी बदल दी थी मिसेज सिन्हा अब जीवन और खुशी को अपनाने के लिए तैयार हों चुकी थी और प्रेम को हर भावनात्मक एह्सांस में व्यक्त करतीं थी |जिसके कारण उनका हृदयरोग पूरी तरह से मिट गया ,मैंने उनकी अंतिम रिपोर्ट चेक की और उन्हें बधाई दी |यह मेरे जीवन की पहली सफलता थी |
मिसेज सिन्हा का अस्पताल आना तो बंद हों चुका था किन्तु स्नेहा के टच में बना रहा,कभी कभार अधीर होकर उसे फोन भी कर देता |एक दिन मैंने अपने दिल की बात कहने का निश्चय कर ही लिया ..मैंने फोन किया “स्नेहा!आज मुझे कुछ कहना हैं ,बिग बाजार में मिलो”...स्नेहा ने कहा “डॉ साहब ! मैं भी आपसे कुछ बताना चाहती हूँ और आपकी मदद चाहती हूँ”|मैंने पहले उसकी सुनने को निश्चय किया |
बिग बाज़ार से निकल कर हम फैमली पार्क पहुंचे और फिर स्नेह से सुनने का आग्रह किया | “डॉ साहेब ,दिल्ली की NIT से B.Tech के दौरान मेरी मुलाकात प्रवीण से हुयी ,वह बिहार का रहने वाला था |बड़े नेक ख्यालात और जाहिद कुदरत का बंदा हैं वो ...मैं उसके काफी नजदीक आ गयी ,हमारे ख्यालात बहुत मिलते जुलते हैं ,हमारी आपसी tuning जबर्दस्त हैं ..कहते कहते स्नेहा की आँखों में चमक आ गयी |b.tech के चौथे साल हमने शादी करने का निश्चय किया ,उसने पापा से मेरा हाथ माँगा ..पापा गुस्सा गए ..रातो रात पुलिसिया रोब का इस्तेमाल कर उसे उठवा लिए और रात भर उनके हमराहियो ने प्रवीण को लाकअप में इतना पीटा की वह एक पाँव से अपाहिज हों गया,उसे मरा जानकर रेलवे ट्रैक पर फेक आए थे |स्नेह के आंसू अविरत उसके गालो पर बह रहें थे ,डॉ साहब प्रवीण के एक मित्र ने बताया हैं की वह कल से दिल्ली में हैं |मैंने अपने रुमाल से उसके आंसू पोछे और सात्वना दी “सब ठीक हों जायेंगा!मैं हूँ ना”!स्नेहा सुबकते हुए बोली “डॉ मैं बिहार की बेटी हूँ!और एक बिहारन जों जबान देती हैं उसे हर कीमत पर निभाती भी हैं ,और अगर आज प्रवीन मेरे साथ शादी करने को तैयार हों गया तो चाहे पापा मेंरी जान ले ले ,मैं उसी से शादी करूंगी , डॉ बाबू |
उसकी भीष्म प्रतिज्ञा से मुझे यकीन हों गया की यह लड़की पीछे नही हटेंगी |
मैंने प्रवीण में भी वही कमिटमेंट देखा ,और साथ देने का भरोसा दिया | २ दिन बाद ही स्नेहा का फोन आया “डॉ साहब आज मैं कोर्ट मैरिज करने जा रहीं हूँ इसके बाद हम लोग हमेशा के लिए बिहार भाग जायेंगे ,प्लीज आज कोर्ट में आ जाईये ,मैंने अस्पताल से आकस्मिक अवकाश लिया और कोर्ट आ गया........ काले कोटो [कौओ]के बीच एक सफ़ेद कोट[हंस] !
उनकी शादी के बाद उन्हें ट्रेन में बैठकर भारी मन से लौट आया और तकिये में मुह छिपाकर खूब रोया .....फिर अचानक से ख्याल आया मैं क्यूँ रों रहा हूँ ...फिर बहुत हंसा...अट्टहास गूंज रहें थे, पड़ोसियों{डाक्टरों} के कान खड़े हों गए ,की भाई अभी तक न्यूरो सर्जन ज्यादातर पगलाते थे ,अब लगता हैं कार्डियो भी पगलाने लगे हैं {अपने भीतर के उस एकतरफा प्यार करने वाले रोमियो पर मैं हंस रहां था , जिसकी महबूबा दूसरों के साथ चली गयीं हों और वह खुद कमजोर महसूस कर रहा हों }|
अचानक फोन की घंटी बजी ,उस तरफ घबराई स्नेहा थी”डॉ साहेब !लगता हैं पापा को पता चल गया हैं,लोकल पुलिस के उनके एक मित्र हमराहियो सहित हर डिब्बे में किसी को धुंध रहे हैं मैं टायलेट में छुपकर उनलोगों की निगाह से बची हूँ” .मैंने कहाँ “स्नेहा अगले स्टेशन पर उतर जाओ मेरी सफेद मर्सिडीज Eक्लास ,UP-70से नम्बर शुरू हैं ,उसी में मैं मिलूँगा” |
मैंने उन्हें दिल्ली से पटना,लगभग हज़ार किमी तूफ़ान की रफ़्तार से ६ घंटे में पहुंचा कर, वापस दिल्ली आ गया |सपनो में जिस तरह सुपरमैंन की तरह गाडी चलाता... पिछली रात को जब वही चीज हकीकत में बदली तब जाकर कहीं सपनों का महत्व पता चला |
दिल्ली मैं अपने कार्य में बहुत व्यस्त हों गया कभी कभार स्नह –प्रवीण का फोन आता फिर हम घंटो बातें करते और हसतें थे ,वे दोनों बहुत खुशी खुशी जीवन बीता रहें थे.....मुझे भी आत्मिक संतोष था क्यूंकि स्नेह बहुत खुश थी |
दिन बीतते गए ,बहुत दिनों से स्नेहा –प्रवीण का नम्बर नही लग रहां था ,मैंने सोचा कुछ मशालेदार खबरे पढूं ,मैं I-NEXT का आनलाईन एडिशन खोल कर पटना के न्यूज को क्लिक किया ... “पत्नी-पत्नी की सरेआम गोली मारकर हत्या’ |छपी फोटो स्नेहा सिन्हा जैसी लगी तो पैरों तले जमीन खिसक गयी|ड्राईविंग की हिम्मत नही पड़ी | मैंने एअरपोर्ट फोन किया कोई एयरलाइन्स नही, फिर तत्काल एसी का टिकट लिया और पटना के लिए रवाना हों गया| उनके गाँव गया तो लोगों ने बताया “स्नेहा और प्रवीण को ,उनके ही आल्टो कार में ,पुलीस ‘LOGO’ लगी स्कार्पियो सवार ,लोगों ने सरेआम गोलियों से छलनी कर दिया उनमे से एक भारी बदन का मुछो वाला व्यक्ति ,करीब जाकर दोनों को दो दो गोली और मारी” ,मुछो वाले व्यक्ति को मैं समझ गया ये मिस्टर सिन्हा थे |
गाँव वाले मुझे CID का आदमी समझ रहें थे ,वे मेरे पास गुड़ और कुएँ का पानी लेकर दौड़े |साहब पानी पी लो ..पर मेरे काले चश्मे मेरी आंखो के आंसू नही छुपा पा रहें थे,इसबात से लोगों के जज्बात खुलकर उभर आये ,प्रवीण के घर वालो ने बहुत रोकने की कोशिश की,मैं नही रुका ..मैं वापस लौट कर अब इस पुलिया पर जामुन के पेड़ की टेक लेकर बैठ गया हूँ |मेरी आँखे नम हैं ,मन चिल्ला चिल्ला कर रोने का कर रहां हैं पिछले १० महीनो में उस लड़की से जिंदगी के कई अनमोल सबक सीखे थे ,शायद ही कोई पल रहां हों जब वो मेरे जेहन में ना रही हों....पता नही था की कौन सा रिश्ता था उससे, पर इतना एकदम स्पष्ट था की मैं उसके लिए पूरे सिस्टम से लड़ने जा रहां था | मैंने झुककर एक मुट्ठी मिट्टी उठाई और प्रतिज्ञा किया की जब तक दोषियो को सजा नही मिल जाती,मैं चैन से नही बैठूँगा |



{काल्पनिक कहानी ,जीवित या मृत किसी पात्र से कोई सम्बन्ध नही }

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