16 November 2012

रेखा मैडम

इलाहाबाद के यमुना तट पर एक पार्क में मैं बैठा हुवा भविष्य के सपने बुन रहा था ,तभी एक प्लास्टिक की बाल पीठ पर लगी ,जिधर से बाल आई थी उधर मुड़ा तो मैंने एक लगभग ४ वर्षीया छोटी बच्ची को मुस्कुरातें हुए पाया ,कुछ कहता की वो बोली ”भईया मुझे क्षमा कीजिये ,ये बाल मेरी हैं खेलते –खेलते आपको लग गयी ,उस बच्ची का चेहरा उसकी उर्जा बड़ी जानी पहचानी सी लगी…..मैंने कहा “कोई बात नही बाबू !जाओ खेलो !मजे करो “तभी पीछे से आवाज आई “सुरेखा !कहाँ खेल रही हों बेटी…..अब मैं चौक गया ये वही अवाज थी जो स्कूल के दिनो में हमारी पसंदीदा आवाज थी ,मुड़ा तो सामने रेखा मैडम के पति थे |
मैं गाँव से पहली बार कसबे के इस स्कूल में आया था .हालाँकि इलाहाबाद में उस समय के पी कालेज,सी ए वी इंटर कालेज ,जी आई सी इन्टर कालेजो का जलवा था ,किन्तु नैनी एक औद्योगिक क्षेत्र था ,और हमारे बड़े भाई यही की एक फैक्ट्री रेमंड में आपरेटर थे इसलिए उन्होंने घर के नजदीकी स्कूल को वरीयता दी|गाव में कभी लड़कियों के स्कूल में नही पढ़ा था और ये पब्लिक स्कूल था ,,  जहां…. को-एजुकेशन की व्यवस्था थी ,इसलिए मैं बहुत शर्मिला हों गया था |यहाँ आने से पहले ११वी की पुस्तकों को एक बार पढ़ लिया था इसलिए मेरी गिनती होनहारो में की जाने लगी ,कुछ ही दिनों में मैं कालेज में हीरो हों गया और अभिमानी भी .. ,किस लड़की का घर किस गली में पड़ता हैं ,कौन लड़की कौन से कोचिंग में पढ़ती हैं इन सब के बारे में समस्त जानकारियों का श्रोत मैं ही था ,यहाँ तक की कुछ नवजवान शिक्षक भी इन जानकारियो को मुझसे लेते रहते थे|उन्ही दिनों हिन्दी के अध्यापक का कहीं डिग्री कालेज में चयन हों गया ,बाद में स्कूल का प्रबंधन एक अध्यापिका खोज कर लाया वो थी –रेखा मैडम |
क्लास में आईं तो सब लडके अपलक उन्हें देखते ही रह गए,२४-२५ वर्षीया तीखे-नैन नक्स की युवती थीं वे |इस उम्र में विहारी के दोहे पढते पढते कहीं ना कहीं श्रृंगार रस हमारे मनो में प्रधान रूप ले चुका था |करीने से साड़ी में लिपटी सांवलेपन में इतनी खूबसूरती हमने पहली बार ही देखी थी |हम सभी उनकी उर्जा से ,उनके अपनेपन से ,उनके स्नेह में बंध गए थे|यह उस उम्र का प्रभाव था ,हमारी नजरे अक्सर उनके चेहरे पर से आकर उनके वक्षों पर टिक जाती थी, और अक्सर हम लोग खुद ही शर्मा जातें थे |लड़कियां तो हमेशा उन पर फ़िदा रहती थी |आस-पास मडराती रहती थी |पढाने में इतनी उर्जा की शब्द सीधे दिमाग में ही घुस जाते थे और रेखा मैम मेरे दिमाग से दिल में घुस रहीं थी |इन्ही दिनों क्लास में सभी लडको ने मेरे नाम से एक लड़की रूचि शुक्ला को चिढ़ाना शुरू कर दिया था ,जिसमे मैं भी कभी कभार दिलचस्पी लिया करता था |[कालेज की भाषा में टाईम पास ],आखिरकार वेचारी रूचि ने एक दिन कालेज की परम्परा को कायम रखते हुए लव लेटर लिखा |और मेरे घर की खिडकी में[जों उसके रस्ते में थी ] डाल ही दिया ,जों नावेल पढ़ रहें मेरे पापा के गोंद में गिरी,पापा कुछ बोले नही ,बस ध्यान से क्लास में पढ़ने को बोल दिया ,उनको मुझपर बहुत यकीं/विश्वास था की मैं कुमार्ग पर नही चलूँगा |उस लेटर को मैंने हिन्दी की किताब में रख दिया जों एक दिन रेखा मैम के हाथ लग गयी –मैम कुछ नही बोली,अपने केबिन में बुलाईं और बस इतना कहाँ की अभी तुम दोनों की उम्र पढ़ने की हैं ,अजय पहले कुछ बन जाओ ,फिर इस तरफ ध्यान लाना और उन्होंने जों कहा उसे मैं अपने ही शब्दों में व्यक्त करता हूँ
“प्रेम कभी हमारे बाहर नहीं होता ,यह हमारे भीतर होता है ,"किसी को पाना है "सिर्फ इसीलिए रिश्ते ना बनायें,समझौता ना करे ,अपने मानदंड स्थापित करें" |
   इसके बाद उन्होंने वशी शाह की कुछ पंक्तियाँ सुनाई-

“मुहब्बत अखिरिश है क्या ? वसी ! मैं हंस के कहता हूँ – 
किसी प्यासे को अपने हिस्से का पानी पिलाना भी ..मुहब्बत है ! भंवर मे डूबते को साहिल तक लाना भी ..मुहब्बत है ! किसी के वास्ते नन्ही सी क़ुरबानी .मुहब्बत है ! कहीं हम राज़ सारे खोल सकते हों मगर फिर भी ,
किसी की बेबसी को देख कर खामोश होजाना भी …मुहब्बत है !
हो दिल मे दर्द , वीरानी मगर फिर भी
किसी के वास्ते जबरन ही मुस्कराना भिओ मुहब्बत है !
कहीं बारिश मे भीगते बिल्ली के बच्चे को
ज़रा सी देर को घर में ले आना , भी मुहब्बत है !
कोई चिडया जो कमरे में भटकती आ गयी हो
उस को पंखा बंद कर , रास्ता बाहर का दिखलाना ,मुहब्बत है !
किसी का ज़ख़्म सहलाना , किसी के दिल को बहलाना ..मुहब्बत है !
मीठा बोल , मीठी बात , मीठे लब्ज़ सब क्या है ?मुहब्बत है !
मुहब्बत एक ही बस एक ही इंसान की खातिरमगन रहना , कब है ?
मुहब्बत के हजारों रंग , लाखों रूप हैंकिसी भी रंग में ,
हो जो हमें अपना बनती है,ये मेरे दिल को भाती है"……….

उनका ढंग सकारात्मकता और हिन्दी पढाने से ….मैं हमेशा प्रभावित रहां |उनको भी कवितायें लिखने का शौक था |हमेशा हर चीज/माहौल के सही रूप/चीज को देखने की आदत हमे उनसे ही मिली थी ,उनका उद्देश्य हम सभी की उर्जा को सकारात्मक दिशा में लगवाना था ,इसलिए वे लगभग रोजाना हम सबसे पूछती थी”आप क्या बनना चाहतें हों?’सबके उत्तर अलग अलग हुवा करते थे,ज्यादातर तो कह ही देते थे की मैम मुझे कुछ नही बनना हैं ,हद तो तब हों गयी जब एक लड़का बोला की “मैम आपई बतावा हम का बन जाई?”.उनके मापदंड ही अलग हुआ करते थे हर चीज को मापने के अक्सर वे किसी कम कम पाने वाले स्टूडेंट के पास जाती और उसका हौंसला अफजाई करती रहती थी,वे अक्सर कहती थी की “किसी के कम अंको से ही उसकी प्रतिभा का मूल्यांकन नही किया जा सकता” |
बच्चों से रेखा मैम का स्नेह हमेशा स्पष्ट रहता था |संक्षेप में यह छात्रों में उच्च आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की भावनाएं स्थापित करने के लिए था ,वे हमेशा हर एक को जबरदस्त महसूस कराती थी ,और उनका तकिया कलाम था “आप में अनंत क्षमताएं हैं” उन्होंने अपने वाक्-पटुता से सिद्धह भी किया की हम ईश्वर के छोटे अंश हैं “|मुझे याद आते हैं वे लम्हे जब उन्होंने मुझसे पूछा –उर्जा संरक्षण का नियम बताओ ?मैंने कहा”उर्जा को ना तो उत्पन्न कर सकते हैं ,ना ही नष्ट कर सकते हैं .बल्कि एक रूप से दूसरे रूप में बदल सकते हैं “|“यानी उर्जा थी… हैं…. और रहेंगी किसी ना किसी रूप में” उन्होंने कहा!मैंने और छात्रों ने उनसे सहमती जताई ,फिर उन्होंने एक चंदनधारी ब्रह्मिन छात्र से पूछा “ईश्वर क्या हैं ,उसके आस्तित्व पर प्रकाश डालो “?उसने कहाँ “ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं ,वह हमेशा से था …हैं…. और रहेंगा” |तब मैम ने कहा “इसका मतलब हैं ,ईश्वर उर्जा हैं ,सकारात्मक उर्जा |जों हम सब में हैं |जिस प्रकार से ईश्वर ने सृष्टि की रचना की उसी तरह हम भी अपनी सृष्टि [करियर ,पढ़ाई ,सम्बन्ध ]निर्मित कर सकते हैं हम सब इंसान के रूप में ईश्वर हैं जिनमे कोई कमी नही” |
वे हमेशा बच्चों के अच्छे कार्यों के लिए उनको प्रोत्साहित करती थी ,उनका मानना था की प्रशंसा से बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता हैं |प्रशंसा से आत्म छवि बेहतर बनती हैं |प्रशंसा से वह खुद पर भरोसा करने लगता हैं और इससे उसे ज्यादा बड़ी और बेहतर चीजे करने का आत्मविश्वास मिलता हैं |
रेखा मैम ! मेरे ख्याल से तब के प्राईवेट स्कूलों के रेट के आधार पर १५००/१००० पातीं रही होंगी अक्सर कहती थी”धन एक साधन हैं,जिससे आप अपने जीवन की प्रिय चीज प् सकतें हैं |प्रेम की आकर्षण शक्ति के पास आपकी मनचाही चीज आप तक पहुचने के अनगिनत तरीके हैं :पैसा भी उनमे से एक हैं”|बिल चुकाते समय ,कहीं अपना पैसा खर्च करते समय हमेशा वह खुशी महसूस करती थीं |रेखा मैम कहती थी “जब कहीं से आपके हांथो में कुछ पैसा आयें ,तो कृतग्य हों,चाहे यह पैसा कितना ही कम क्यूँ ना हों !याद रखें,कृतज्ञता अच्छी चीजों को कई गुणा बढ़ा देती हैं”
बाहरी संसार की परिस्थितियों को बदलने की कोशिश में जमीं आसमान एक करने की तुलना में अपने एहसास को बदलना ज्यादा आसान हैं |भावनाओं को बदलतें ही बाहरी परिस्थितियाँ अपने आप बदल जातीं हैं |जिस व्यक्ति को जों देते हैं वही वापस पातें हैं |अक्सर प्रधानाचार्य शिकायत करतें थे आप बच्चों को डाटती नही हैं ,तो वे कहती थीं -दयालुता ,प्रोत्साहन ,सहयोग कृतज्ञता या किसी भी अच्छी भावना के माध्यम से प्रेम दिया जाता हैं तो यह लौटकर वापस आता हैं “सच बात हैं जैसे ही रेखा मैम आतीं थी क्लास में ऐसा लगता था जैसे सकारात्मक उर्जा फ़ैल जाती थी ,वे हम लोगों को सीमित करने वाले दायरो से ऊँचा उठाना चाहती थीं |अक्सर उत्साह वर्धन करती थी ,वे हर क्षेत्र की सर्वोच्च चीजों के बारें में सोचतीं थी और हमे भी यही सुझाती थी |
            वे कहतीं थी की हम लोगों को अपना ध्यान उसपर रखना हैं जों हमे पाना हैं ,हमारा हर विचार उर्जा लिए होता हैं यदि हम पूरे दिल से वह विचार अपना लेते हैं तो वह विचार हमे अपना लेता हैं ,और हमारी जिंदगी की हकीकत में बदल देता था |
                     हमारे कालेज में सभी धर्म /जाति के बच्चे आतें थे वे कहतीं थी
जैसे मै अपने धर्म में परिवर्तन नही चाहती हूँ , उसी तरह किसी ईसाई , पारसी , यहूदी और मुसलमान को उसका धर्म बदलने को न कहूँ , न राय दूँ अथवा न चाहूं । सभी धर्मों में कुछ कमी हो सकती है या है ; परन्तु जैसे मै अपने धर्म में पक्की हूँ वैसे ही सभी धर्म के लोग अपने में पक्के बने रहें । यही मेरे अनुसार धर्म के समझ का सार है । 
मै चाहती हूँ कि सभी धर्म के लोग यही प्रार्थना करें कि यदि वे हिंदू हैं तो और अच्छे हिंदू बन सकें ; अगर मुस्लमान हैं तो और बेहतर / अच्छे मुस्लमान बनें और इसी तरह और बेहतर / अच्छे ईसाई , पारसी आदि आदि बनें । 
            सभी धर्मों में वही कहा गया है जो मनुष्य के हित में हो और जिससे हम प्रेम , करुणा , अहिंसा , भाईचारा , एकता विश्वबंधुत्व और विश्व शान्ति की स्थापना कर सकें । जो अपने धर्म को ठीक से समझ लेता है वह निश्चित ही दूसरे धर्मों का आदर करेगा । ” जब हम अच्छा करते हैं तो हमें अच्छा अनुभव होता है और जब हम कुछ बुरा करते हैं तो हमें बुरा अनुभव होता है ; यही मेरा धर्म है ” – अब्राहम लिंकन । और – ” जब हम अच्छाई और सच्चाई के साथ अपनी आत्मा के साथ जीवन बिताते होते हैं तो वही हमारा धर्म होता है ” – एलबर्ट आइन्स्टीन ।
                    रेखा मैम को प्यार हों गया था |बहुत खुश रहती थी !…हम लोगों को अक्सर उस व्यक्ति से ईर्ष्या होती थी जों उनको ले जाने की कामना रखता था |अब उनके चेहरे पर ज्यादा चमक रहती थी |लगातार हम लोग क्लास में उनका इन्तेज़ार करतें और चाहते की हर क्लास उन्ही की हों …
                   अब कक्षा में, बिहारी की दोहों में रंगबिरंगे सपने दिखतें थे ,और उन रंग-बिरंगे सपनो को हम कल्पना में देख भी लिया करतें थे |एक धर्मशास्त्री का कथन हैं-“जैसे-जैसे आपके भीतर प्रेम बढ़ता हैं ,सुंदरता भी बढ़ती हैं |क्यूंकि प्रेम ही आत्मा का सौंदर्य हैं “|उसी समय हिन्दी में एक रूपक पढ़ा था”तुम्हारे रूप की गंध और नेत्रों की मौन भाषा प्राणों में घुलकर जब फूल जैसी खिलती है तो आत्मा का संगीत उठता है , जिससे प्रेम -पंख उड़ने लगते हैं , उस आकाश में , जहां परमात्मा का सातवाँ द्वार है – परम आनंद का , ” सच्चिदानन्द ” का , और वहीँ सत्य , चेतना और आनंद एक होकर सम्पूर्ण श्रृष्टि में बिखरते है ,सूर्य किरण से , यही हमारे पुण्य की पराकाष्ठा है , प्रेम की निष्काम पुण्य-अंजलि “
                   उन्ही दौरान हम लोगों ने हिन्दी की एक पैरोडी कहीं से लिखी थी |पर चाहकर भी उनको सुना नही पाया लीजिए आज आपको सुना रहां हूँ –
“हिन्दी की क्लास थी , टीचर उदास थी |पति से थी लड़कर आई , 


        अब काहे की पढ़ाई |बच्चों ने कहाँ टीचर पढाओ ,        
 टीचर ने कहा मेरा सिर मत खाओ |
 पिछली बार गाय पर निबंध लिखा था,           
इस बार पति पर निबंध लिख लाओ |
 यूँ तो पति का नाम सुनकर हर बच्चा घबराया ..
       किन्तु एक जीनियस चश्मिश कुछ यूँ लिख कर लाया —–
“पति एक दीन असहाय,आज्ञाकारी पशु हैं जों कुछ कुछ इंसानों जैसा होता हैं |वह पत्नियो का पालतू होता हैं |आकडो के अनुसार पिछले वर्षों में पालतू पशुओ की संख्या बढ़ी हैं |पत्नियाँ हमेशा इस जीव को पगहे में बाँध कर रखती हैं ,और सिर से खतरे का लाल सिग्नल देती हैं क्यूंकि इस जीव को बाहर मुह –मारने की आदत होती हैं |
वर्तमान समय में पतियों की २ नसले पायी जा रहीं हैं –
१]जोरू का गुलाम
जोरु का गुलाम :-पिछले कई वर्षों से इस प्रजाति के पति बढ़े हैं ,जिसके फलस्वरूप वृध्हा आश्रमो ,और बुजुर्गो पर अत्याचार भी बढ़े हैं |
२]जोरू का बादशाह-इस प्रजाति के पति विलुप्ति के कगार पर हैं ,सरकार को नयें “बादशाह बचाओ केन्द्र” खोलने की जरूरत हैं ,इन्ही प्रजातियो ने ने ही संयुक्त परिवार और घर के वृध्हो को भगवान का दर्जा दे रखा हैं ..जिसके कारण अपनी ही मन मस्तिष्क में कुंठा जन्म देके इनकी पत्नियां अक्सर वीमार ही रहती हैं “
                   आखिर वो दिन आ ही गया जब रेखा मैम की शादी थी !शहनाई और आर्केस्ट्रा की धुनें बज रही थी क्लास के कुछ चुनिन्दा लड़के आमंत्रित थे ,मन में अजीब सा दर्द था पता नही उनसे बिछुड़ने का या कुछ और…बस उनकी शादी में इधर उधर हम लोग भागतें रहे ….शामिल रहे ,मजे करते रहें …विदाई के वक्त ऐसा रुदन-क्रन्दन हुवा की दुल्हे राजा भी रोये बिना ना रह सके…..गाडी उनके पिया घर की तरफ बढ़ चली और हमारे आँखों से आंशुओ की मोटी धारें भीं….गाडी सहसा १०० मित्र जाकर रुकी ,और फिर उनके पति ने बुलाया “अजय !इधर आईये ,मैं गया तो देखा मैम बुला रहीं थी “बोली !बेटा तुमसे मुझे बहुत आशाएं हैं”उनका कथन और इस आवाज की टोन आज भी मेरे कानो में गूजती हैं ,जिसके कारण मैं कामचोरी और आलस्य को त्याग कर पाने में सफल हुवा ,जब भी मैं कोई निरर्थक कार्य करता हूँ तो वही आवाज आज भी मेरे कानो में गुजती हैं |वक्त बीतता गया मैंने सुना की मैम इलाहाबाद की किसी गाँव में सास के साथ  ज्यादातर रहतीं थी ,पर अपने पति के पास हर सप्ताह आती हैं |एक दिन उनके देवर से मुलाकात हुयी उनसे मिलने की इच्छा की ,तो वह बताया की मैम प्रेग्नेंट हैं,शनिवार को शहर आएँगी |बहुत खुश हुए अब तक  हम मेडिकल की तैयारी में लग गए थें |
                        पहली डिलीवरी थी सो एहतियात बरतते हुए उनके पति ने उन्हें शहर के ही एक हास्पिटल में उनको भर्ती करा दिया |यह वही शहर था जहां वे गाँव की एक सिम्पल लड़की से रेखा मैम बनी थीं |यहाँ की गलियाँ ,पक्षी,पशु मनुष्य सभी से मैम का एक खास रिश्ता था |मैम को देखने इतने लोग आते थे की वहाँ का स्टाफ उन्हें सेलेब्रिटी समझता था |मिलने वाले इतना फल लातें थे की मैम के पति उन फलो को बैगो में भरकर ले जाया करते थे |जैसे जैसे उनकी डिलीवरी का वक्त नजदीक आ रहा था,हास्पिटल प्रबंधन सावधानी बरतते हुए मिलने वालो पर रोक लगा दिया |वेटिंग रूम हमेशा भरा रहता था | आखिर डाक्टरों ने २४ घंटे का एक्सपेक्टेड समय दे ही दिया,मुझे याद पढ़ता हैं कम से कम ४० उनके पढाये छात्र वहाँ जम गए ……रात को २ बजे इमेरजेंसी में डॉ को जगाया गया और आपरेशन से बच्चा होना था …….खून की जरूरत आ पड़ी ……इस वक्त हर कोई बहुत उत्तेजित था |हर कोई खून देना चाहता था …अंत में मेरा ब्लड ग्रुप मैच किया और मेरे तीन और साथियो का भी …हमने रक्त दिया ,हमारे दिल को राहत मिली |किन्तु सुबह के ५:४५ पर डॉ ने कहा “she is no more”|
ये सबसे बड़े दुःख का दिन था |सुबह के ६ बजे तक सैकड़ों छात्र एकत्रित हों चुके थे |
सभी लोग बहुत दुखी थे |दुखीं मन से हम लोग उनके अन्त्येस्थी में शामिल हुए ,वे तो चली गयीं किन्तु उनके शब्द गुन्ज्तें रह गए “बेटा ,मुझे तुमसे बहुत आशाएं हैं”!मैंने संकल्प किया की चाहे जों कुछ हों जाय मैं डॉ बनूँगा !और ऐसा डॉ बनूँगा जिसके दिल में इंसानियत /आदमियत हों , सिर्फ डिग्री लेना हिन्  नही दक्षता प्राप्त करना मेरा उद्देश्य बन गया ,ac में नही सुदूर ग्रामांचल में झोपड़े के नीचे भी अपने देश की लोगों के साथ   सोना  ,और रात भर जाग जाग कर बुनियादी सुविधाए उपलब्ध करना मेरा लक्ष्य बन गया|आज ४ साल बाद अचानक इस मुलाकात से उत्तेजित सुरेखा के पापा ने {मैम के पति] जिद किया की हम उनके घर चले |हम गयें ,जहां वे रहते थे |रेखा मैम !वहाँ की हर दीवार में जिन्दा थी .ऐसे लगता था जैसे पुकार उठेंगी “तुम आ गए”| वही इत्र की खुसबू ,मैम की पसंद के रंग के पर्दे, करीने से रखी उनकी चप्पले,आलमारी में रखी उनकी वही किताबे जों हमे पढ़ाया करती थी !अब आंसू नही रुके! उनके कमरे की साफ सुथरी चमकती एक एक चीज देखकर मैंने सोचा क्या कोई किसी को इतना प्यार कर सकता हैं ??की उसके मरने के बाद भी पागलो की तरह उसे चाहे ?यही बात मैंने सुरेखा के पापा से पूछी तो वे बोले “रेखा जी !मेरे मरने से पहले मुझसे नही अलग हों सकती “!
कुछ तो हैं प्रेम में वरना सीरी –फरहान ,लैला मजनू ना जाने कितने अफ़साने कैसे बनते ,इतनी पवित्र जज्बातों भरी  मुहब्बत ,बिना शर्तों काअसीम  प्रेम ...मेरी कल्पना से परे था !

मुहब्बत एक खुशबु है हमेशा साथ चलती है 
कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता 
[-बशीर बद्र]
लेखन -अजय यादव 

3 November 2012

"उल्फत के लहूँ "

शरद पूर्णिमा की उस निःशब्द शान्ति में मैं उस गाँव की पगडंडी पर बढ़ता चला जा रहा था |दूर सुदूर से कुत्तों के भौकने की आवाजे ,सियारो के रोने की आवाजो का एक प्रवाह सा आता और फिर शांत हों जाता ,गाँव कि इस पगडंडीनुमा सड़क पर एक जीर्णशीर्ण पुलिया हैं ,जिससे सटा जामुन का एक विशालकाय वृक्ष हैं ,मैं उसी पुलिया पर वृक्ष से टेक लगाकर बैठ गया ...और गहरे विषाद कि स्थिति में आँखों के सामने अँधेरा सा छा चुका हैं |स्नेहा से मेरी मुलाकात दिल्ली के एक बड़े सरकारी अस्पताल में हुयी थी वह अपनी हृदयरोगी माँ के साथसाथ,जों कि मेरी पेशेंट थी ,आतीं थी ,मूलतः विहार के पटना कि निवासी थी और दिल्ली NIT में अभियांत्रिकी से स्नातक थीं |
शनिवार कि उस सुबह मेरी ड्यूटी फेमस CARDIOLOGIST,सीनियर रेजिडेंट और मेरी शिक्षिका डॉ इंदिरा जी के साथ थी |हमेशा कि तरह OPD फुल थी ,केस स्टडी की फाईल आतीं ,रोगी आता ....फिर नेक्स्ट ..|१९वे नम्बर पर मिसेज सिंहा थी ,और उनके साथ उनकी सुपुत्री स्नेहा सिन्हा भी थी |यह हमारी पहली मुलाकात थी ,स्नेहा कुछ बोल रहीं थी ,उसकी लबो की जुंबिश और उफक से नूर भरे चेहरे ने कुछ क्षण के लिए वक्त थाम सा दिया था ,आवाजे कुछ पलों के लिए सुनाई देनी बंद हों गयी | “डॉ साहेब” ....इंदिरा मैम की कड़क आवाज में मैं कुर्सी से उठ गया “यस मैम” !सब हंस पड़े |
रविवार की उस शाम अपने रोजमर्रा के कार्यों को निपटा कर मैं दिल्ली की गलियो में घूमने निकल पड़ा ,किसी शहर में जहां आप नये हों ,कितना अच्छा लगता हैं स्वछन्द विचरण करना |मैं आज अपने भीतर से हृदय रोग उत्पन्न होने के संभावित कारणों की तलाश में निकला था ………………….
हमारा दिल प्रेम का प्रतिनिधि हैं और रक्त खुशी का |दिल प्यार से हमारे शरीर में खुशी भरता हैं ,जब हम खुशी और प्यार को अपनाने से इनकार कर देते हैं तो हृदय सिकुड़ जाता हैं ,और ठंडा हों जाता हैं इसकी वजह से रक्त धीमा हों जाता हैं और लोग एनीमिया ,एन्जिना ,और हृदयाघात की ओर बढ़ने लगते हैं |
दोस्तों !जीवन बहुत आसान हैं ,हमे करना ५ काम चाहिये पर करते २५ हैं ,हम अपने ही द्वारा उत्पन्न किये हुए सोप ओपेरा और नाटकों में इतने उलझ जाते हैं की अक्सर उन छोटी छोटी खुशियों पर ध्यान देना भूल जातें हैं जों हमारे आस-पास होतीं हैं |हम बरसो तक अपने दिल से सारी खुशियों को निचोड़ते रहते हैं |जिससे अंत में वह पीड़ा से कराहने लगता हैं |मेरी सीनियर सर्जन बॉस अक्सर कहतीं हैं “जिन लोगों में हृदयाघात होता हैं ,वो कभी खुश नही रहते ....यदि वो समय रहते जीवन की खुशियो को अपना नही लेते तो उन्हें दूसरा हृदयाघात हों सकता हैं” |इन्ही ख्यालो में गुम चला जा रहां था,….. तभी मेरे सामने सरपट भागती एक स्कूटी अचानक से रुकी ,हेलमेट का काला शीशा उठा और स्नेहा सिन्हा की मधुर आवाज भी “हों डाक्टर बाबू .....जी ,कहाँ घुमत बटला.”..शुद्ध बिहारन शैली ,दिल बाग बाग हों गया और आवाज नही निकली |”आवा साहेब ,हमारा घर पास हिन् हैं ,मम्मी आपसे मिलकर बहुत खुश होंगी ..” मैं उनकी स्कूटी पर बैठ गया .उनकी शीरीं आवाज की प्रतिध्वनिया बार बार मेरे कर्णपटलो पर गूंज जातें ,मैं उनके साथ होने के एह्सांसो में ही खो जाना चाहता था ,हवाओं की सरसराहट और दिल की धडकन के सिवा चेतन रूप से मैं कुछ भी नही सुन रहां था |
अभिवाद्नोपरांत मिसेज सिन्हा ने कृतज्ञता भरे स्वरों में अपने पति से परिचय कराया “यही कार्डियो सर्जन हैं जिनकी कृपा से हैं आप सबके साथ हूँ”! “वोह डॉ साहेब !इस खाकसार को विशाल सिन्हा कहते हैं ,वरिष्ठ PPS OFFICER ,बिहार पुलिस” | फिर उन्होंने अपनी दबंगई के किस्से शुरू किये जों एक मुझ जैसे डॉ के लिए बकवासथी ,बातों बातों में उन्होंने पूंछा “आप कहाँ के रहने वाले हैं “ मैंने कहा “इलाहाबाद” यू पी .................भाई मैं भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का पढ़ा हूँ ..वे बात काट कर बोले “ये इलाहाबाद यूनिवर्सिटी हैं ना . अपने LOGO में लिखा .”क्वाट रामी टाट”{एक वृक्ष अनेक[हज़ार ]शाखाए }की कहावत को चरितार्थ करतीं हैं ,..मैं पूरे भारत में जहां कहीं गया हूँ ,जिन भी वरिष्ठ शिक्षकों ,बुद्धजीवियो,और नौकरशाहों से मिला हूँ ७५%से ज्यादा तो इलाहाबाद की उपजाऊँ भूमि की उपज हैं .... मैंने उनकी सहमती में सिर हिलाया बात तो सहीं ही कह रहे थे |फिर कटरा की गलियों ,नेतराम की मिठाईयां ,संगम ,आनंद भवन ,होस्टलो के चर्चे इन सबसे से खालिस इलाहाबाद माहौल तैयार हों गया |तीन घंटे कब बीत गए पता हिन् नही चला ,मैंने अनुमति मांगी तो बोले डॉ साहेब डिनर करके ही जाईये ...मिसेज सिन्हा के आग्रह को मैंने मान लिया,उनमे मेरी माँ जैसी आज्ञा झलक रहीं थी |
भारत की राजधानी दिल्ली में मिट्टीके बर्तनों में पकी दाल,चावल और मिट्टीके तवें पर सिकी रोटी की शायद आप कल्पना नही कर सकतें ....शायद यह दाल मेरे जीवन की खायी गयी सबसे स्वादिष्ट दाल थी | मिसेज सिन्हा मेरे विचारों को भांप चुकी थी वो बोली “मिट्टी ऊष्मा की कुचालक हैं ,इसमें भोजन धीरे धीरे गर्म होता हैं और सभी MICRONUTRIENTS धीरे धीरे भोजन में आ जातें हैं |ये निरापद और पौष्टिक भोजन हैं ...मैंने कहाँ ये रोटी बड़ी स्वादिष्ट हैं .मिसेज सिन्हा बोली “इस रोटी में गेहूं का आटा ,सत्तू,चने का बेशन ,एक छोटा चम्मच अश्वगंधा मिला हैं,अच्छा डॉ साहेब…! आपकी शादी हुयी की नही ?मेरा चेहरा सुर्ख लाल हों गया मैंने कहाँ “नही”!डॉ साहब शर्माते बहुत हैं कह कर मिस्टर सिन्हा हंस पड़े| भोजनोपरांत मिस्टर सिन्हा ने अपने फरजंद{पुत्र} को बुलाया “डॉ साहेब को इनके होस्पिटल तक छोड़ आओ”...मैं हॉस्पिटल लौट आया |
न जाने कितने दिनों बाद माँ के हांथो पके भोजन जैसा भोजन किया था |इस परिवार के उस दिन किये गए आतिथ्य सत्कार ने मेरे हृदय में उनका स्थान बना दिया था |OPD में अक्सर मैं मिसेज सिन्हा को ज्यादा वक्त देता, ARTIOSCLEROSIS के सिवा उनकी सब समस्याएँ दूर हों गयी थी,ARTIOSCLEROSIS के संभावित कारणों में “प्रतिरोध,तनाव ,सख्त संकीर्णता ,उत्तम को देखने से इनकार करना होता हैं”|
स्नेहा सिन्हा से बातों बातों में ही मोबाईल नम्बर मांग लिया था ,मैंने उनसे २० मिनट बात करने की अनुमति चाही और मिसेज सिन्हाको पूरी तरह ठीक करने के लिए उसकी हेल्प मांगी |मिसेज सिन्हाकी मानसिक प्रोग्रामिंग स्नेहा की मदद से मैंने काफी बदल दी थी मिसेज सिन्हा अब जीवन और खुशी को अपनाने के लिए तैयार हों चुकी थी और प्रेम को हर भावनात्मक एह्सांस में व्यक्त करतीं थी |जिसके कारण उनका हृदयरोग पूरी तरह से मिट गया ,मैंने उनकी अंतिम रिपोर्ट चेक की और उन्हें बधाई दी |यह मेरे जीवन की पहली सफलता थी |
मिसेज सिन्हा का अस्पताल आना तो बंद हों चुका था किन्तु स्नेहा के टच में बना रहा,कभी कभार अधीर होकर उसे फोन भी कर देता |एक दिन मैंने अपने दिल की बात कहने का निश्चय कर ही लिया ..मैंने फोन किया “स्नेहा!आज मुझे कुछ कहना हैं ,बिग बाजार में मिलो”...स्नेहा ने कहा “डॉ साहब ! मैं भी आपसे कुछ बताना चाहती हूँ और आपकी मदद चाहती हूँ”|मैंने पहले उसकी सुनने को निश्चय किया |
बिग बाज़ार से निकल कर हम फैमली पार्क पहुंचे और फिर स्नेह से सुनने का आग्रह किया | “डॉ साहेब ,दिल्ली की NIT से B.Tech के दौरान मेरी मुलाकात प्रवीण से हुयी ,वह बिहार का रहने वाला था |बड़े नेक ख्यालात और जाहिद कुदरत का बंदा हैं वो ...मैं उसके काफी नजदीक आ गयी ,हमारे ख्यालात बहुत मिलते जुलते हैं ,हमारी आपसी tuning जबर्दस्त हैं ..कहते कहते स्नेहा की आँखों में चमक आ गयी |b.tech के चौथे साल हमने शादी करने का निश्चय किया ,उसने पापा से मेरा हाथ माँगा ..पापा गुस्सा गए ..रातो रात पुलिसिया रोब का इस्तेमाल कर उसे उठवा लिए और रात भर उनके हमराहियो ने प्रवीण को लाकअप में इतना पीटा की वह एक पाँव से अपाहिज हों गया,उसे मरा जानकर रेलवे ट्रैक पर फेक आए थे |स्नेह के आंसू अविरत उसके गालो पर बह रहें थे ,डॉ साहब प्रवीण के एक मित्र ने बताया हैं की वह कल से दिल्ली में हैं |मैंने अपने रुमाल से उसके आंसू पोछे और सात्वना दी “सब ठीक हों जायेंगा!मैं हूँ ना”!स्नेहा सुबकते हुए बोली “डॉ मैं बिहार की बेटी हूँ!और एक बिहारन जों जबान देती हैं उसे हर कीमत पर निभाती भी हैं ,और अगर आज प्रवीन मेरे साथ शादी करने को तैयार हों गया तो चाहे पापा मेंरी जान ले ले ,मैं उसी से शादी करूंगी , डॉ बाबू |
उसकी भीष्म प्रतिज्ञा से मुझे यकीन हों गया की यह लड़की पीछे नही हटेंगी |
मैंने प्रवीण में भी वही कमिटमेंट देखा ,और साथ देने का भरोसा दिया | २ दिन बाद ही स्नेहा का फोन आया “डॉ साहब आज मैं कोर्ट मैरिज करने जा रहीं हूँ इसके बाद हम लोग हमेशा के लिए बिहार भाग जायेंगे ,प्लीज आज कोर्ट में आ जाईये ,मैंने अस्पताल से आकस्मिक अवकाश लिया और कोर्ट आ गया........ काले कोटो [कौओ]के बीच एक सफ़ेद कोट[हंस] !
उनकी शादी के बाद उन्हें ट्रेन में बैठकर भारी मन से लौट आया और तकिये में मुह छिपाकर खूब रोया .....फिर अचानक से ख्याल आया मैं क्यूँ रों रहा हूँ ...फिर बहुत हंसा...अट्टहास गूंज रहें थे, पड़ोसियों{डाक्टरों} के कान खड़े हों गए ,की भाई अभी तक न्यूरो सर्जन ज्यादातर पगलाते थे ,अब लगता हैं कार्डियो भी पगलाने लगे हैं {अपने भीतर के उस एकतरफा प्यार करने वाले रोमियो पर मैं हंस रहां था , जिसकी महबूबा दूसरों के साथ चली गयीं हों और वह खुद कमजोर महसूस कर रहा हों }|
अचानक फोन की घंटी बजी ,उस तरफ घबराई स्नेहा थी”डॉ साहेब !लगता हैं पापा को पता चल गया हैं,लोकल पुलिस के उनके एक मित्र हमराहियो सहित हर डिब्बे में किसी को धुंध रहे हैं मैं टायलेट में छुपकर उनलोगों की निगाह से बची हूँ” .मैंने कहाँ “स्नेहा अगले स्टेशन पर उतर जाओ मेरी सफेद मर्सिडीज Eक्लास ,UP-70से नम्बर शुरू हैं ,उसी में मैं मिलूँगा” |
मैंने उन्हें दिल्ली से पटना,लगभग हज़ार किमी तूफ़ान की रफ़्तार से ६ घंटे में पहुंचा कर, वापस दिल्ली आ गया |सपनो में जिस तरह सुपरमैंन की तरह गाडी चलाता... पिछली रात को जब वही चीज हकीकत में बदली तब जाकर कहीं सपनों का महत्व पता चला |
दिल्ली मैं अपने कार्य में बहुत व्यस्त हों गया कभी कभार स्नह –प्रवीण का फोन आता फिर हम घंटो बातें करते और हसतें थे ,वे दोनों बहुत खुशी खुशी जीवन बीता रहें थे.....मुझे भी आत्मिक संतोष था क्यूंकि स्नेह बहुत खुश थी |
दिन बीतते गए ,बहुत दिनों से स्नेहा –प्रवीण का नम्बर नही लग रहां था ,मैंने सोचा कुछ मशालेदार खबरे पढूं ,मैं I-NEXT का आनलाईन एडिशन खोल कर पटना के न्यूज को क्लिक किया ... “पत्नी-पत्नी की सरेआम गोली मारकर हत्या’ |छपी फोटो स्नेहा सिन्हा जैसी लगी तो पैरों तले जमीन खिसक गयी|ड्राईविंग की हिम्मत नही पड़ी | मैंने एअरपोर्ट फोन किया कोई एयरलाइन्स नही, फिर तत्काल एसी का टिकट लिया और पटना के लिए रवाना हों गया| उनके गाँव गया तो लोगों ने बताया “स्नेहा और प्रवीण को ,उनके ही आल्टो कार में ,पुलीस ‘LOGO’ लगी स्कार्पियो सवार ,लोगों ने सरेआम गोलियों से छलनी कर दिया उनमे से एक भारी बदन का मुछो वाला व्यक्ति ,करीब जाकर दोनों को दो दो गोली और मारी” ,मुछो वाले व्यक्ति को मैं समझ गया ये मिस्टर सिन्हा थे |
गाँव वाले मुझे CID का आदमी समझ रहें थे ,वे मेरे पास गुड़ और कुएँ का पानी लेकर दौड़े |साहब पानी पी लो ..पर मेरे काले चश्मे मेरी आंखो के आंसू नही छुपा पा रहें थे,इसबात से लोगों के जज्बात खुलकर उभर आये ,प्रवीण के घर वालो ने बहुत रोकने की कोशिश की,मैं नही रुका ..मैं वापस लौट कर अब इस पुलिया पर जामुन के पेड़ की टेक लेकर बैठ गया हूँ |मेरी आँखे नम हैं ,मन चिल्ला चिल्ला कर रोने का कर रहां हैं पिछले १० महीनो में उस लड़की से जिंदगी के कई अनमोल सबक सीखे थे ,शायद ही कोई पल रहां हों जब वो मेरे जेहन में ना रही हों....पता नही था की कौन सा रिश्ता था उससे, पर इतना एकदम स्पष्ट था की मैं उसके लिए पूरे सिस्टम से लड़ने जा रहां था | मैंने झुककर एक मुट्ठी मिट्टी उठाई और प्रतिज्ञा किया की जब तक दोषियो को सजा नही मिल जाती,मैं चैन से नही बैठूँगा |



{काल्पनिक कहानी ,जीवित या मृत किसी पात्र से कोई सम्बन्ध नही }

27 October 2012

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रहस्य:व्यक्तिगत कायाकल्प का भाग –२

रहस्य:व्यक्तिगत कायाकल्प का भाग –२


बुल्गारिया के मनोवैज्ञानिक लोजनोव दुनिया भर से मिलने वाले super learning के उदाहरणों से हैरान थे,उन्होंने देखा की मुस्लिम विश्वविद्यालायो में प्रवेश से पहले मुस्लिम छात्रों को पूरा कुरान याद हों जाता था ,भारतीय गुरुकुलो के छात्रों को पूरी गीता और रामायण याद हों जाती थी |
भारत के कई धर्मों/पंथो में लिखित धर्मग्रन्थ या सामग्री नही हैं |इन पंथो के गुरू और अनुनायी अपना ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से पहुचाते रहें हैं ,
लोजनोव ने शोध किया की २ मस्तिष्क होते हैं दायां और बायां |
दांया मस्तिष्क तार्किक ,रेखीय ,व्यावहारिक हैं यह तर्कशक्ति ,विश्लेषण और गणनाकरता हैं ,यह तस्वीरों और कहानियो के संदर्भ में सोचता हैं |यह सम्पूर्णतावादी हैं और किसी विचार या स्थिति के सभी पहलुओ से एक साथ संपर्क रखता हैं |बांया मस्तिष्क तार्किक जानकारी से प्रेरित होता हैं |दांया मस्तिष्क शिथिल अवस्था में जानकारियों को ज्यादा अच्छी तरह से प्रोसेस करता हैं |लोजानोव ने पाया की जब दोनों मस्तिष्क साथ कार्य करतें हैं तो सीखने की गती तेज हों जाती हैं | लोजानोव ने ब्रेन वेव के विभिन्न स्तरों पर शोध किया ,उन्होंने जागृत अवस्था की बीटा वेव्स स्तर {१४ वेव /सेकंड से ज्यादा ],एल्फा अवस्था [८-१३वेव्स/सेकंड]और थीटा अवस्था [५से ७वेव्स/सेकंड ]पर शोध किया |उन्होंने पाया की अल्फ़ा अवस्था सीखने के लिए सबसे ज्यादा आदर्श अवस्था हैं |उन्होंने अपनी खोजो को मिलाकर एक ऐसी तकनीक इजाद की जिससे किसी भी प्रकार की जानकारी सीखी और संगृहीत की जा सकतीथी |इसे आज accelerated learning कहा जाता हैं |

लोजानोव की accelerated learning तकनीक :-

लोजानोव ने पाया की अगर आप किसी व्यक्ति को शिथिलता की गहरी अवस्था यानि अल्फ़ा अवस्था में रखकर नई जानकारी देतें हैं और पृष्ठभूमि में धीमा शास्त्रीय संगीत बज रहां हों ,तो दाया और बांया मस्तिष्क सामंजस्य में आ जातें हैं और सीखने की गति तेज हों जाती हैं |
उन्होंने अपने प्रयोंगो के दौरान व्ययस्को को क्लासो में गहरी शिथिलता में बैठाया ,जिनकी आँखे बंद थी और कमरे में मंद मंद संगीत बज रहा था उसके बाद विदेशी भाषाओ की सूचियां पढ़ी और उन्हें अलग अलग तरीको से दुहराया गया |फिर विद्यार्थियो को जागृत अवस्था में लाकर उनकी स्मृति की जाँच की गयी ,विद्यार्थियो को सीखी गयी ९७% बातें याद थी |लोजानोव ने शिथिलता के उन्नत तरीको का इस्तेमाल कर १९६९ में एक दिन में १००० शब्द छात्रों को याद कराएँ ,१९७४ में विद्यार्थियो की एक खास कक्षा में लोजानोव ने एक दिन में १८०० शब्द याद कराए |बाद में १९७९ में ३००० शब्द एक दिन में याद कराने में वे सफल रहें |उन्होंने सिद्धह किया की तीव्र गती से तथ्य ,जानकारी नये व्यवहार ,नयी मानसिक आदतें सीखना संभव हैं |दोस्तों भारत में भी कुछ ऐसे गुरू हैं जिनको मैं जानता हूँ जों की ऐसे शांत एल्फा मूजिक को बेचते हैं [विदेशो की तुलना में बहुत अल्प दरों पर]जिनसे हम लोजनोव के प्रयोग से भी ज्यादा लाभ ले सकतें हैं ,मैंने भी यह खुद करके देखा हैं |

हेटरोजेनिक कंडीशनिंग :-

यह आपके बजाय किसी दूसरे द्वारा की गयी प्रोग्राम्मिंग या कंडिशनिंग हैं |ये वे चीजे हैं ,जों माता-पिता ,रिश्तेदारों,टीचर्स और कैन अन्य सम्मानित लोगों ने आपको बतायीं हैं |
जब भी आप दूसरों की कोई बात सुनते हैं ,खासकर उस व्यक्ति से जिसे आप पसंद करते हों …तो यह आपके अवचेतन मन को प्रभावित करता हैं |इसलिए आपको कभी भी किसी को ऐसी बात कहने की इजाजत नही देनी चाहिये ,जिसे आप सचमुच ना देखना चाहते हों|मान लीजिए कोईकह भी दिया तो आप खुद को कम से कम २ – सकारात्मक आत्म सुझाव दीजिए |आप मेरे[अजय यादव]के ब्लॉग को तब तक पढ़ चुके होंगे | आप एक बहुत ही सशक्त सिद्धांत के साथ काम कर रहें हैं और आपको इसका इस्तेमाल सकारात्मक तथा सृजनात्मक तरीके से करना चाहिये |
टेप के म्यूजिकल संकल्प :-

१] सब्लिमिनल टेप्स सुनना :-बाजार में ऐसे बहुत सारें सब्लिमिनल टेप्स हैं ..पर ज्यादातर बकवास हैं |भारत में माईंड पावर रिसर्च इंस्टिट्यूट और डॉ जितेन्द्र अधिया का एल्फा मूजिक का टेप्स हैं |माईंड पावर रिसर्च इंस्टिट्यूट के टेप्स मैंने अब तक सबसे उम्दा लाजवाब पाया हैं |
२]रिलेक्सेशन टेप्स :-संगीतमय संकल्प वाले टेप्स प्रयास हिन् और आसान हैं |अगर आप दिन भर में दो बार यानि सुबह शाम इनका अभ्यास करतें हैं तो आप ज्यादा सकारात्मक ,ज्यादा शांत ज्यादा रचनात्मक होंगे और अपनी भावनाओं पर ज्यादा नियंत्रण भी रख पायेंगे |आपकी कई छुटपुट बिमारियां भी खत्म होंगी |मैंने ऐसे भी लोंगो को देखा हैं ,जिन्होंने इन तकनीकों के इस्तेमाल से बड़ी बीमारियो को भी ठीक किया हैं |एक २० मिनट का रिलेक्सेशन टेप ४ घंटे की नींद के बराबर आराम देता हैं |भारत में ऐसे टेप्स आज उपलब्ध हैं हिन्दी भाषा में ट्रेनर हिमानी { http://www.clickabooks.com/index.php/relaxation-hindi-audio-cd-700.html} या डॉ जितेन्द्र अधिया के टेप्स उपलब्ध हैं { http://www.clickabooks.com/index.php/all-time-gujarai-cds-vcds-dvds/relaxation-hindi-audio-cd.html} डॉ अधिया के टेप्स शक्तिशाली हैं |इसी प्रकार का टेप माईंड पावर इंस्टिट्यूट द्वरा निर्मित जीनियस सीडी हैं |ये वास्तव में परम शक्तिशाली हैं |दोस्तों इन सबके अलावा सर्वोत्तम यह होंगा की अपना टेप हम खुद तैयार करें |उसमे अपना लक्ष्य खुद रिकार्ड करे जबकि पृष्ठभूमि में दूसरे टेप में आप अपने संकल्प को रिकार्ड कर लें जबकि पृष्ठभूमि में शांत संगीत बज रहा हों |घर पर बना कैसेट भी आपके लक्ष्यों को हांसिल करने की प्रोग्रम्मिंग में बहुत असरदार हों सकता हैं |

फटाफट संकल्प तकनीक :-

इस तकनीक का इस्तेमाल किसी महत्वपूर्ण घटना से पहले कर सकते हैं जैसे सेल्स काल या बॉस के साथ मीटिंग या मेडिकल सेमिनार्स |मानसिक प्रोग्रम्मिंग की इस विधि का इस्तेमाल प्रोफेशनल वक्ता ,अभिनेता,कलाकार और बड़े बिजिनेस मैंन करते हैं |इससे वे आने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए खुद को तैयार कर लेते हैं ,जब उनके सर्वश्रेष्ठ रूप में रहना उनके लिए महत्वपूर्ण होता हैं |
फटाफट संकल्प तकनीक में मानसिक तैयारी के पहले बताये गए कदमो की टेलिस्कोपिंग शामिल हैं |यह एक तरह से मानसिक वार्मअप हैं |आप इसे ३० सेकंड से भी कम समय में कर सकतें हैं |आप अपनी कार ,लिफ्ट या वाशरूम में भी इस तकनीक का प्रयोग कर सकते हैं |
इस तकनीक का इस्तेमाल काफी आसान हैं आप अकेले होतें हैं ,अपनी आंखे बन करते हैं ,आदर्श परिणाम का संकल्प करते हैं ,उसकी मानसिक तस्वीर देखते हैं ,उसमे भावना भरते हैं और उसे मुक्त कर देते हैं |देखे और महसूस करें की वह घटना सफलता पूर्वक हों गया हैं |फिर उस मीटिंग या कार्यक्रम में शांतिपूर्वक और आत्मविश्वास के साथ जाईये |
अगर आपको कुछ दिनों में कोई महत्वपूर्ण प्रस्तुति देनी हों या इंटरव्यू देना हों तो उस बारे में सोचते समय आपको हर बार इस तकनीक का प्रयोग करना चाहिये |जब आप घटना वाले दिन और समय के ज्यादा करीब पहुँचते हैं तो आपको अपना आत्मविश्वास बढ़ता हुआ प्रतीत होंगा |और वास्तविक घटना के समय आप सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए मानसिक रूप से तैयार हों चुन्केंगे |

ऑटोजेनिक कंडीशनिंग विधि या रिलेक्सेशन और विजुलायिजेसन :-

{विजुलायिजेसन के लिए एक मार्गदर्शक आडियो पेश हैं -

http://www.ziddu.com/download/20636671/11.mp3.html}

इस अभ्यास में आप संकल्प लेने ,मानसिक तस्वीर देखने ,भावना भरने और तस्वीर को मुक्त करने से पहले अपने पूरे शरीर को रिलेक्स करते हैं |
आरामदेह कुर्सी पर या विस्तर पर लेट जाईये ,अपने पूरे शरीर को रिलेक्स कीजिये …आँखे बंद कीजिये अपने शरीर के भागो से बातचीत किजीयें ..सब अंगों को रिलेक्स किजीयें
या
कोई शांत जगह पसंद कर लें जहां आपको १५-२० मिनट तक कोई विक्षेप ना हों |बिलकुल आरामदेय स्थिति में बैठें |
चेहरा सीधा करके ,अपनी नजरो को दूर के किसी काल्पनिक विन्दु पर स्थिर करें और विना पलक झपकाएं उस विन्दु को देखतें रहें |
पलके भारी होते ही आँखे बंद कर लें और अपना ध्यान साँसों पर रखें |सांस को देखिये की कैसे अंदर आती हैं ..बाहर निकलती हैं ,साँसों का निरीक्षण कीजिये |फिर १० से एक तक की गिनती करते जाईये |आपका शरीर धीरे धीरे शिथिल और शांत होता जायेंगा |१ गिनती के समय आप एल्फा अवस्था में होंगे …[ब्रेन वेव्स-७से १३]आपकी ब्रेन वेव्स चेतन और अवचेतन मस्तिष्क को समान स्तर पर रखती हैं इस समय आप खुद को जों भी सुझाव देंगे वह हर हाल में आपकी दुनिया में प्रकट होंगा ही |आपको जों चीज पाना हैं …उसकी आप मानसिक मूवी देखिये –मानसिक मूवी मात्र देखने के लिए नही हैं इसमें आपकी भागीदारी भी होनी चाहिये ,गतिमान चित्र होने चाहिये ,घटनाये वर्तमान काल की हों ,रंग /आकार की पहचान होनी चाहिये |इसमें स्थान [घर /आफिस /क्लिनिक]का उलेख कीजिये,समय का उल्लेख कीजिये[सुबह /शाम ],कौन कौन से पात्र हों ,सभी पात्र खुश दिखने चाहिये |लोगों की आवाजे ,वस्तुओ की आवाजे ,ट्रैफिक की आवाजे …गंध ,स्वाद का अनुभव …स्पर्श का अनुभव सब आपकी मानसिक मूवी की स्क्रिप्ट में शामिल होना चाहिये |बेहतर होंगा की आप अपनी मानसिक मूवी की स्क्रिप्ट पहले ही लिख लीजिए |
इस तकनीक का इस्तेमाल आप अपने संबंधो ,कार्यस्थल ,वित्तीय जीवन,सेहतअन्य गतिविधियों में डरो से उबरने में और आत्मविश्वास बढ़ाने में कर सकते हैं |यह किसी घटना का मानसिक रिहर्शल हैं |ओलम्पिक के स्वर्ण विजेता हों या मेरे जैसे छात्र लगभग सभी जागरूक लोग इस तकniक का इस्तेमाल कर अपने जीवन में क्रांति ला चूंके हैं |
http://www.divshare.com/download/23661574-0d6
[विस्तर पर लेट जाईये ,जहां कोई अआप्को डिस्टर्ब ना करे फिर इस आडियो को सुनिए ,या किसी आराम कुर्सी पर बैठकर ,जहां रीढ़ कि हड्डी सीधी रहे ….खुद को रिलैक्स कर सकते हैं,आप सदैव प्रसन्न रहे ,शुभकामनाओं सहित ……!जब भी दिक्कत महसूस कीजिये आडियो तुरन्त निकाल दीजिए ,मत सुनिए और हाँ हेडफोन से और अच्छा महसूस करेंगे }–drakyadav@rediffmail.com

रहस्य :व्यक्तिगत कायाकल्प का {भाग -१}

रहस्य :व्यक्तिगत कायाकल्प का {भाग -१}
मित्रों !मैंने पढ़ा हैं की सन १८५९मे जेनेवा के डॉ .एमिल कुए के क्लिनिक में सवास्थ्य लाभ की दर अन्य अस्पतालों या क्लीनिको की तुलना में पांच गुनी अधिक पायी गयी थी |वे हर मरीज को यह कहना सिखाते थे “हर दिन हर तरीके से मैं बेहतर और बेहतर महसूस कर रहां हूँ “|
उनके क्लिनिक में डॉ और नर्स हर मरीज का यह कहकर अभिवादन करतें थे “हर दिन हर तरीके से आप बेहतर और बेहतर दिख रहें हैं”
बाद में जर्मन डॉ शुल्ज ने ,जों की एक मनोचिकित्सक भी थे उन्होंने देखा की व्यक्ति खुद से बात करते समय जितनी शान्ति से कहता था की “हर दिन हर तरीके से मैं बेहतर और बेहतर महसूस कर रहा हूँ”उतनी ही जल्द वह स्वास्थ्य प्राप्त कर रहा हैं |डॉ शुल्ज एक मनोचिकित्सक थे और वे डिप्रेसन ,न्युरासिस ,तनाव उन्मूलन पर कार्य कर रहें थे |
डॉ शुल्ज ने अंततः आटोजेनिक कंडीशनिंग की परक्रिया विकसित की ..जिसे आप आगामी लेखो में पढेंगे …. विश्व भर के अनेक सेमिनारों में शामिल होकर मैंने भी कुछ चीजे सीखी हैं …और इन पर शोध जारी हैं …….इन चीजों को ही प्रश्नोत्तर के रूप में पेश कर रहा हूँ :-
प्रश्न १]
अपने अवचेतन मन का प्रयोग कैसे करें ?
उत्तर-
यहाँ ५ कदमो की एक प्रक्रिया हैं .जिसका इस्तेमाल आप मनचाहे मानसिक,शारीरिक,भावनात्मक परिणाम पाने के लिए कर सकतें हैं |
१]अपने मनचाहे परिणाम को [जिसे आप पाना चाहते हैं ]को शब्दों में व्यक्त कीजिये और उसे पाने का संकल्प कीजिये |
आपका कथन इच्छित परिणाम या अंतिम अवस्था का स्पष्ट वर्णन होना चाहियें |विवरण में ही ना उलझें रहें |
२]आप उस स्थिति में जों परिणाम चाहतें हैं ,उसकी मानसिक तस्वीर बनाएँ और उसे स्पष्ट रूप से देखें |खुद को और हर शामिल व्यक्ति को परिणाम के साथ खुश देखना जरूरी हैं |
३]अपने संकल्प और मानसिक तस्वीर को भावनात्मक बनाएँ |वह “भावना”पैदा किजीयें जों आप सुखद परिणाम पाने पर सचमुच महसूस करेंगे|
कल्पना कीजिये की आप सफल हों गयें हैं और लक्ष्य प्राप्त हों गया हैं |
४]स्थिति को पूरी तरह से मुक्त कर दीजिए …इसे इस स्थिति में छोड़ दें ,जैसे किसी विश्वशनीय व्यक्ति ने आपको ये आश्वासन दे दिया हों की वह इसे संभल लेंगा और आपको इसके बारे में दोबारा सोचने की जरूरत नही हैं |
५]प्राप्ति ,लक्ष्य का मिलना |
                                  अपने लक्ष्यों को,सपनो को जल्दी कैसे साकार करे ?
                                                                मानसिक तकनीकें
प्रश्न २]क्या अपने लक्ष्यों को लिखकर,संकल्प करके उन्हें और जल्दी प्राप्त कर सकतें हैं ?
उत्तर :-
           जी हाँ |
वर्तमान काल में अपने मुख्य लक्ष्यों को ,उद्देश्यों को स्पष्ट वर्णन के साथ लिखिये |ठीक वैसा ही जैसा आप उसे हकीकत में देखना चाहतें हैं |आप इस वर्णन को जितना भी लंबा या छोटा रखना चाहते हों रख सकते हैं |यह संक्षिप्त भी हों सकता हैं विस्तृत भी |
अपने लक्ष्य लिखने के बाद पेन नीचे रख दीजिए |अपनी आँखे बंद कर दीजिए ,गहरी सांस लीजिए और अपने लक्ष्य की मानसिक तस्वीर इस तरह बनाईये की जैसे यह हांसिल हों चुका हों या दिन भर की घटनाओं के संतुष्टि से सुलझने की मानसिक तस्वीर देखें |मानसिक तस्वीर देखते वक्त वह भावना पैदा कीजिये,जों सफलता के बाद मिलतीं हैं |लक्ष्यों की उपलब्धि पर मिलन वाली खुशी का मुस्कुराते हुए आनंद लीजिए |फिर इसे पूरी तरह से मुक्त कर दीजिए छोड़ दीजिए …..असीमित सत्ता के लिए |अपनी आँखे खोल लीजिए और अपना दिन शुरू कीजिये |
लिखना अपने अवचेतन मन पर अपने अक्ष्यो की छाप छोड़ने का सबसे सशक्त तरीका हैं |आप अपने लक्ष्यों को जितनी बार लिखते हैं ,वे उतनी ही ज्यादा तेजी से हांसिल होते हैं |
लक्ष्यों को कैसे लिखें?एक स्पायिरल नोटबुक लें .,उसमे हर दिन अपने लक्ष्य लिखियें |इसमें सिर्फ कुछ मिनट का समय लगता हैं किन्तु इससे आपकी प्रोग्रम्मिंग कई घंटो आगे की हों जाती हैं |अपने लक्ष्यों को बार बार लिखने से आपको पहले से ज्यादा विश्वास होने लगता हैं |की उन्हें हांसिल किया जा सकता हैं |जब आपका विश्वास गहरा होता जाता हैं और आत्मविश्वास बढ़ता हैं तो आप लक्ष्यों को पाने के अवसरों को बढ़ा देतें हैं और law of attraction को सक्रिय कर देतें हैं |इसके बाद लक्ष्य आपको प्राप्त होने लगतें हैं |
प्रश्न ३]standard affirmation technique क्या हैं ?
उत्तर :-इसमें आप तीन से पांच इंच के इंडेक्स कार्ड पर अपने लक्ष्यों को बड़े बड़े अक्षरों में लिख लेते हैं …………..वर्तमान काल में और स्पष्ट शब्दों में |
इस विधि का उपयोग सुबह और रात्रि को कीजिये …कोई इसी जगह बैठिये जहां आपको कुछ मिनटों तक कोई डिस्टर्ब ना करें |शरीर को शीथील कीजिये और मस्तिष्क को तैयार करने के लिए गहरी गहरी साँसे लीजिए ..और छोडिये ….
अपना पहला लक्ष्य[कार्ड]पढ़िए,आँखे बंद करके इसे ५ बार दुह्रारायियें,लक्ष्य की मानसिक तस्वीर इस तरह से देखिये जैसे यह हांसिल हों चुका हों |कल्पना करें की वह लक्ष्य इस समय हांसिल हों चुका होता तो आप कैसे चलते ,बात करते और काम करतें |लक्ष्य की अपनी इस तस्वीर में भावना ,खुशी व् वह सुख भारियें जों आपको लक्ष्य प्राप्त होने पर मिलेंगी |
फिर एक और गहरी सांस लीजिए …और छोडिये और लक्ष्य को आत्मविश्वास से मुक्त किजीयें |अपने हर लक्ष्य के साथ ही ऐसा ही कीजिये |आपका अवचेतन मन इस तरीके से एक बार में बीसों लक्ष्यों पर सफलता पूर्वक कार्य कर सकता हैं |
प्रश्न ४] standard affirmation technique का इस्तेमाल सुबह शाम दो बार करने की कोई विशेष वजह ?
उत्तर ;-जी हाँ |वैसे आप चाहे तो केवल सुबह या शाम भी ,इस तकनीक का इस्तेमाल कर सकतें हैं |
सुबह बाहर निकलने या अपने काम पर जाने से पहले आप अवचेतन मन को प्रबल संकेत भेजते हैं |परिणाम स्वरूप आपका अवचेतन मन आकर्षण का नियम सक्रिय कर देता हैं और दिन भर के लिए आपकी जागरूकता बढ़ा देता हैं |ताकि आप अपने आस पास हों रही घटनाओं को देखकर एक या अधिक लक्ष्य पूरा करने के अवसर को ताड़ लें |
इसी तरह से रात को सोने से पहले आप अपने अवचेतन मन को रात में लक्ष्यों पर काम करने का निर्देश दे देतें हैं ,अक्सर सुबह जागने पर आपका अवचेतन मन आपको सही विचार और समाधान सुझा देता हैं | क्रमशः………………….
-अजय यादव {ajayyadav@myself.com]

24 September 2012

"power of your subconcious mind" अवचेतन मन की शक्तियाँ


हमारा अवचेतन मन बहुत शक्तिशाली हैं |यह हमारे मन का ९०% भाग हैं किन्तु यह उस गाड़ी की भाति कार्य करता हैं जिसका ड्राईवर चेतन मन [१०%]हैं |आईये आज हम अवचेतन मन की शक्तियों के बारे में बात करतें हैं |

१]Riflex Action:-

मित्रों !अवचेतन मन की यह शक्ति हमे आपातकालीन स्थितियों से हमे बचाती हैं ,जैसे अग्नि पर पैर पड़ते ही अचानक हटा लेते हैं ,सांप को देखकर उलटे ही भाग खड़े होतें हैं |सीडी से गिरते गिरते संभल जातें हैं |पहले हम साईकिल सीखते हैं तो धीरे धीरे किन्तु जब हम पूरी तरह सीख जातें हैं तो लोगों से बात करते हुए भी सयिक्लिंग करते हैं |

२]टेलीपैथी :-

 ईश्वर ने हमारे मन मस्तिष्क में एक TRANSMITTER और एक RECIEVER फिट कर रखा हैं जों इतना शक्तिशाली हैं की पूरे ब्रम्हाण्ड में इतनी शक्तिशाली मशीन किसी इंसान ने नही बनायीं हैं |चूँकि हम इस मशीन को चलाना नही जानते इसलिए इसकी शक्तियों से अनजान हैं |

३]अंतरात्मा की आवाज़ [रडार –CONSCIENCENESS]:-

दोस्तों जब भी हम कोई गलत कार्य करतें हैं तो अंदर से आवाज़ आती हैं “ये गलत हैं”…भगवान ने इंसान को गलत कार्य से रोकने के लिए उसके भीतर यह रडार सेट कर रखा हैं जों अवचेतन मन के नियंत्रण में हैं |

४]यादशक्ति :-MEMORY के ३ स्टेप होते हैं :-

१]Ragister 2]Storage 3]Recalling
दोस्तों Ragister और Recalling चेतन मन की विषय वस्तु हैं |जबकि Storage अवचेतन मन से जुड़ा होता हैं |किन्तु यदि Storage सही से हुवा हैं तो रिकाल्लिंग आसान हों जाती हैं |

५]भावना का गुणांक [EMOTIONAL Quotient]:- दोस्तों भावना २ प्रकार की होती हैं –

१]सकारात्मक भावना :-प्रेम,दया ,क्षमा ,कृतज्ञता ,प्रफुल्लता ,Faith,Tolerance,करुणा |
२]नकारात्मक भावना :-डर,क्रोध,घृणा ,ईर्ष्या ,sadism,चिंता,निर्दयता आदि |
                                                
उच्च IQ ही सफलता का मानक नही हैं बल्कि EQव्यक्ति को सफल बनाता हैं |उच्च शिक्षित व्यक्ति कभी कभार कम EQ के कारण हमारे ORGANISATION को बड़ी हानि पहुंचाता हैं |मर्लिन मुनरो ,अभिनेत्री दिव्या भारती ,हिटलर ,गुरुदत्त सब बहुत उच्च IQ के थे पर इनमे EQ उच्च नही था |इन सबने आत्महत्या की थी|EQ बढ़ाने के लिए सकारात्मक भावनाओं को बढ़ाना होंगा |

6]Treasure of Knowledge[त्रिकाल ज्ञान]:-

हमारे अवचेतन मन से बहुत ,भविष्य ,वर्तमान कुछ भी नही छुपा हैं |यह त्रिकालदर्शी हैं ,यह भविष्य की घटनाओं को भांप लेता हैं और कभी कभार हमे चेताता भी हैं |संजय ने महाभारत की भविष्यवाणी इसी आधार पर की |इसी के आधार पर NOSTRADOMUS इतना प्रसिद्द हुआ |

७]प्रज्ञा/समझदारी /WISDOM:-

सही समय पर सही निर्णय लेना ही अवचेतन मन की विशेषता हैं |जब भी आप किसी गफलत में पढ़ने वाले हों निर्णय आप अवचेतन मन पर छोड़ दें यह आपके विश्वासों के अनुरूप सबसे उत्तम रिजल्ट लाएंगा|

८]आयोजन कर [PLANNING]:-

ज्यादातर प्लानिंग हम चेतन मन से करते हैं ..इसको ह्यूमन प्लानिंग कहते हैं ,जिसमे हम अक्सर फेल हों जाते हैं तब हम कहते हैं “man proposes but god disproposes”.भगवान का तो कुछ बिगाड़ नही सकते ,बिगाड़ सकते हैं तो सिर्फ अपना हीं|
किन्तु जब हम अर्धजग्रित मन से प्लानिंग करते हैं तो यह devine planning
होती हैं जों हर हाल में पूरा होती ही हैं |अक्सर मेरे लक्ष्य अर्धजग्रित मन द्वारा planned होते हैं |

9]अवसर खड़े करना [creats opportunity]:-

हमारा अर्द्ध जागृत मन हमारे लिए अवसर क्रियेट करता हैं |इलाहाबाद में मैं पढ़ा लिखा ,उस दौरान एक ऐसा समय आया था , जब मेरे पास पाकेट मनी तक नही थी,बाहर ना घूमने वा अंतर्मुखी स्वभाव के होने के कारण लोगों से पहचान तक नही थी |मैंने यह समस्या अवचेतन मन को सौंप दी |मुझे एक दिन प्रेरणा प्राप्त हुयी की मैं एक पुस्तक लिखूं ,पढ़ाई तकनीकों पर |मैंने लिखा परिणाम ये हुवा की वह पुस्तक हांथो हाथ बिकी |कालेजो से लेक्चर के लिए रिक्वेस्ट आने लगी |सैकड़ों छात्र मेरी क्लासेज में पढ़ने के लिए इस तरह से उतावले होते की जैसे मैं कोई बड़ी सेलेब्रटी{फिल्मस्टार} हूँ |मैंने अपनी खुद की कोचिंग बनायीं और खुद को इतना मजबूत बना लिया आर्थिक रूप से की आज मैं अपनी मेडिकल की फ़ीस खुद भर सकता हूँ |

१०]mental clock:-

दोस्तों हमारे अवचेतन मन के पास एक नैशर्गिक घड़ी हैं |जों हमे एक सही समय पर उठा देती हैं |मैं कभी अलार्म घड़ी सेट नही करता बल्कि अपने मन को कमांड दे देता हूँ की मुझे अमुक समय पर उठाना हैं मन विना देरी किये उठा देता हैं |

११]मानसिक कैलेंडर :-

मित्रों आपको जीवन में जों भी पाना हैं उसकी एक निर्धारित समय सीमा का उल्लेख जरुर किजीयें |तभी अवचेतन मन उस पर सही से कार्य कर पाएंगा |आपको कोई गोल किस वर्ष प्राप्त करना हैं ?कौन सी गाड़ी कब खरीदनी हैं ?सबका लिखित लेखा जोखा होना चाहिये ,यदि आप दुनिया की सबसे शक्तिशाली शक्ति को [अवचेतन मन ] को काम पर लगा रहें हों |…

१२]इच्छा-मृत्यु [control over death]:-

डॉ दीपक चोपड़ा ने एक पुस्तक लिखी हैं :”Ageless Body,Timeless Mind”जिसका सारंश यह हैं की अपनी मृत्यु हम खुद चुन सकतें हैं की कहाँ मरना हैं?कब मरना हैं ?किस स्थिति में मरना हैं ?..PLACE,MODE AND TIME….
दोस्तों ऐसे केस शायद आपने देखे होंगे जब डॉ ने रोगी को मरणासन्न स्थिति में घर भेज दिया हों और रोगी बच गया हों या डॉ ने कह दिया हों की अब तू मरने वाला हैं पर रोगी बच गया हों |डॉ भगवान नही हैं |ना ही हमारे अवचेतन मन से उसका मुकाबला हैं,kyunki ज्यादातर डॉ चेतन मन से इलाज करते हैं  |

१३]HEALING POWER:-

मैंने एक ऐसा व्यक्ति देखा हैं जों लगातार सोच सोच कर अपने शरीर में कंसर उत्पन्न कर लिया था और कैंसर भी इतना भयानक की टाटा हास्पिटल मुम्बई के डाक्टरों ने जवाब दे दिया था |बाद में उसको लुईस हे की “YOU CAN HEAL YOUR LIFE” बुक मिली ,पढ़कर वह पूरी प्रोसेज समझ गया और अपने एहसास और भावनाओं को बदला ,फिर दो महीने बाद कैंसर जड़ से खत्म ही हों गया ,डॉ तो हैरान ही रह गयें |दुनिया की सबसे शक्तिशाली हीलिंग पावर हमारे अवचेतन मन के पास हैं यह कोई बीमारी उत्पन्न भी कर सकता हैं तथा प्रोसेज को रिवर्स कर ठीक भी कर सकता हैं |

१४]स्वास्थ्य :-

जब भी आप से कोई पूछता हैं -:कैसे हों”?आप क्या कहते हों “FINE”..यह कहने का तात्पर्य हैं आप अपने अवचेतन मन को कह रहें हैं की सब ठीक हैं कुछ करने की जरूरत नही हैं |अवचेतन मन हमारे AUTONOMOUS NERVOUS SYSTEM पर पूरा कंट्रोल रखता हैं ,जों की हमारे शरीर में पाचन ,श्रावण,हारमोन पैदा कर, नियंत्रण के लिए जिम्मेदार होता हैं जब भी हम चेतन मन के माध्यम से कोई भी निगेटिव कमांड अवचेतन मन को देते हैं तो बीमारी पैदा होतीं हैं |
आप कहिये जवाब में “BETTER AND BETTER”…यानी कल जितना अच्छा था आज उससे भी और ज्यादा अच्छा हूँ |

१५]CONTROL OVER PAIN :-

दोस्तों आपने विपशयना केन्द्र के बारे में सुना ही होंगा |इसके जों हेड हैं गोयनका जी ,उनको माईग्रेन की बीमारी थी |विपश्ना करने के बाद उनकी बीमारी पूरी तरह ठीक ही हों गयी |और फिर उन्होंने अपना उद्योग धंधा छोड़कर अपना पूरा जीवन इसी को दे दिया |विपश्यना यानि “मन की रिप्रोग्रम्मिंग” |

१६]क्रिएटिव थिंकिंग [CREATIVE THINKING]:-

Ordinary thinking:-चेतन मन से |
creative thinking:-अवचेतन मन से |
दोस्तों वाल्ट डिज्नी ,पंडित रविशंकर,लिनार्दो दा विन्ची आदि सभी ने क्रिएटिव थिंकिंग कर दुनिया को अनमोल रत्न दिया |लिनार्दो दा विन्ची को Wisest man of world  कहा जाता हैं |

१७]Control over every part of body:-

महान महर्षि योगी जिन्होंने श्री श्री रविशंकर और डॉ दीपक चोपड़ा को tm meditation सिखाया, जब खुद ध्यान में होतें थे तो हवा में उपर उठ जातें थे |इसको yogic flying कहतें हैं |हमारा अवचेतन मन परम शक्तिशाली हैं |इसका हमारे शरीर के हर भाग पर काबू होता हैं |

१८]सारे विश्व के उपर असर [influence over universe]

मित्र जब तानसेन ने दीपक राग’ गया तो आग भड़क उठी ,ताना रे रे ने राग मल्हार गाया तो बारिश होने लगी |सीता मईया के एक कमांड से धरती फट गयी और् सिर्फ राम नाम लिखने से पत्थर तैरने लगे !कौन सा विज्ञान यह सब की व्याख्या करता हैं |यह सब अवचेतन मन की शक्तिया हैं |
मेरे गुरू श्री श्री रविशंकर जब बंगलौर में अंतर्राष्ट्रीय आश्रम में होते हैं तब उनकी  ध्यान-साधना बादल आते हैं ,बरसते हैं |आप कभी भी आश्राम में आकर यह देख सकते हों |वहाँ के साप,विछुओ,हिंसक जानवरों तक में से हिंसा खत्म हों गयी हैं |वहाँ हमेशा हरियाली रहती हैं यह मेरे गुरू की अवचेतन मन की शक्तियों का एक छोटा नमूना मात्र हैं |

१९]अपार सर्जन शक्ति :-दोस्तों ताजमहल ,एफिल टावर ,रिलायंस ,आदि अपर सृजन शक्ति के उदाहरण हैं |हम सभी अवचेतन मन का इस्तेमाल कर अपनी मन पसंद श्रृष्टि निर्मित कर सकतें हैं |

२०]निजी भगवान :-

दोस्तों हर धर्म में भगवान से हम क्या चाहतें हैं –प्रेरणा,उर्जा ,मार्गदर्शन |यह सब अवचेतन मन हमे देता हैं इसलिए इसे मैं हरेक व्यक्ति का निजी भगवान कहता हूँ |

21]SQ[आध्यात्मिकता का अंक]:-

दोस्तों आपके अनुसार आध्यात्मिकता क्या हैं ?कमेन्ट के माध्यम से जरूर बतायियेंगा !
मेरे अनुसार मन ,वचन ,कर्म की एकरूपता ,जों औरो को खुश करें वही आध्यात्मिकता हैं |
मेरे हिसाब से आध्यात्मिकता क्या हैं ??
१]To do job with honesty
2]To repay a loan in time
3]to keep a promise
4]to maintain a value in business
SQ>EQ>IQ

२२]चुम्बकीय शक्ति [मैग्नेटिक पावर]:-

दोस्तों हम सभी एक चुम्बक हैं और अपने जीवन में हर उस चीज को खीच सकते हैं जों हमे पसंद हों |किन्तु इस मैग्नेट को हमे हमेशा चार्ज करते रहना होंगा |इसके लिए “शबरी तकनीक” अपनाना पड़ेगा |जैसे राम ..राम हमेशा शबरी करती गयी और राम को जाना ही पड़ा वैसे ही आपको जों चाहिये बस उसी के बारे मे सोचे ,करें |पैसा चाहिये तो पैसा पैसा पैसा …..पावर चाहिये तो पावर पावर …..अनथक अविरत करते रहे ..यह हर हाल में आपकी दुनिया में प्रकट होंगा |यह हर हाल में होंगा हीं|

11 July 2012

मन और जीवन {डॉ अजय की कलम से }

मन ही ईश्वर , 
मन ही देवता
मन से बड़ा ना कोय |
मन उजियारा जग जग फैले
जग उजियारा होय |
मेरे दोस्तों मैं अजय यादव  आपके सामने एक बार फिर मन के रहस्यों लेकर हाजिर हूँ |दोस्तों जिस तरह से ,गुरुत्वाकर्षण का नियम हैं ,कूलाम्ब का नियम हैं ,गति के नियम हैं ठीक उसी तरह मन के नियम भी सर्वव्यापी और सत्य हैं ,यह आप इसे ऐसे समझ सकते हैं की चाहे आप अच्छे व्यक्ति हों या बुरे यदि आपको २० मंजिली ईमारत से धकेल दिया जाय  ,आप नीचे ही गिरेंगे......... ये बात सर्वकालिक  सत्य हैं |वैसे ही मन के नियम भी सर्वथा सत्य हैं |

विश्व के सबसे बड़े सबसे शक्तिशाली ,क्षमतावान कम्प्यूटर के मालिक आप हैं |यह कम्प्यूटर इतना शक्तिशाली हैं की हम अपने सम्पूर्ण जीवन काल में इसकी क्षमता का ८ से १० % ही इस्तेमाल कर पातें हैं ,जानकारी के आभाव में इससे ज्यादा इस्तेमाल करना हम नही जानतें हैं |सवाल ये हैं की इसका पूरा इस्तेमाल कैसे किया जा सकता हैं –
हमारा मन २ प्रकार का हैं –
१]चेतन
२]अवचेतन

चेतन मन केवल जाग्रति अवस्था में कार्य करता हैं जबकि अवचेतन मन सदैव सक्रिय रहता हैं |हमारे शरीर की पांचो इन्द्रियों पर ,हलन-चलन [movement],और हमारे विचारों पर जागृत मन का नियंत्रण रहता हैं |हमारी तर्कशक्ति ,पृथक्करण शक्ति [analyitical power],अनुमान ,और अर्थ-घटन शक्ति भी हमारे जागृत मन से नियंत्रित हैं |हममे जो बुद्धि-प्रतिभा हैं ,अवसर को पहचानने की क्षमता हैं ,सही –झूठ को पहचानने की क्षमता हैं ,निर्णय लेने की जो क्षमता हैं और निर्णय पर अमल करने की जो क्षमता हैं.... वह चेतन मन के पास हैं  .सुबह से लेकर शाम तक हम जो इच्छाएं पैदा करते हैं वह जागृत मन से करतें हैं
 
चेतन मन तो हम हमेशा इस्तेमाल करते हैं आईये अवचेतन मन के बारे में,उसकी शक्तियों के सन्दर्भ में बातें करें...........|
हमारा अवचेतन मन सर्वशक्तिमान हैं ,उसका वजूद ही हमारे भलाई के लिए हैं |अर्धजग्रित मन चौबीसों घंटें ,आठो पहर ,हमारे लियें कार्य करता हैं |हमारे साथ यह जन्म से सक्रिय हैं  |यह हमारे जन्म से ही हमारे साथ हैं ,इसी ने हमारे समस्त शरीर का निर्माण भी किया हैं [बाईबिल के अनुसार....]अवचेतन मन की कार्य-प्रद्धति कम्प्यूटर जैसी हैं |जैसे कम्प्यूटर को चलने के लिए प्रोग्राम की जरूरत होती हैं उसी तरह से हमारे अवचेतन मन को चलने के लिए प्रोग्राम की अवश्यकता होती हैं |प्रोग्राम यानि हमारा नजरिया ,धारणाये ,मान्यताएं
इत्यादी |हमारा अवचेतन मन माता-पिता ,शिक्षक ,मित्र ,समाज  की धारणाओं के अनुसार कार्य कर रहा हैं ,क्यूंकि उसे हमने अपनी खुद की धारणाओं के अनुसार अभी ढालना नही सीखा हैं |इसके लिए हमे लगातार हमारे लिए सकारात्मक,उर्जात्मक विचारों का एक नियमित आत्म सुझाव देना हैं |इन आत्म्सुझावो को हमारा मस्तिष्क ग्रहण कर लेता हैं और उनके अनुसार कार्य करता हैं ..........हमारे अवचेतन मन के पास अपनी कोई च्वाईस नही होती हैं जो भी बोला जाय ,चाहे आप बोले या आपके आस-पास वह इसे ग्रहण कर लेता हैं और इस पर प्रतिक्रिया देना शुरू के देता हैं ..............
ज्यादातर प्राथमिक स्तर पर  हमारे शिक्षक लोग.....या हमारे अभिभावक गण बच्चों के अच्छे प्रदर्शन ना कर सकने पर या उनके मन मुताबिक कार्य न करने पर उन्हें नकारात्मक ,बातों से संबोधित करते हैं जैसे –
तुम बुद्धू हों.................................................................................... |
तुम जीवन में कुछ नही कर सकते ...................................................|
वेवकूफ................................................................. |
इस तरह की नकारत्मक बातें कोमल ग्रहणशील ,मस्तिष्क वाले ,बच्चों के मस्तिष्क में भर जाती हैं |जिससे उनका प्रदर्शन लगातर गिरता जाता हैं |
भारत जैसे विशाल देश में सही मायनों में शिक्षकों की नितांत कमी हैं ,लोग कुछ और ना कर पाने पर शिक्षक बनते हैं ....बिना मन[गहरी सोच] के गैर जिम्मेदार उत्पाद [विद्यार्थी] निर्मित करते हैं ....विश्वविद्यालयो में लगातार बढ़ती हिंसा और छात्रों का लगातार अनैतिक कार्यों एवं गैर कानूनी कार्यों में लिप्त होना ..........प्राथमिक स्तर पर बच्चों के मन की सकारात्मक कंडीशनिंग ना हों पाने के कारण होती हैं ...जो की देश का दुर्भाग्य हैं |एक कहावत हैं”there should be no wall between school and society”,पर देखा जाय तो समाज और स्कूल के बीच काफी गैप नज़र आता हैं |ज्यादातर लोगों का कोई लक्ष्य ही नही होता !जो भी बन गये ,या जहा भी पहुँच गए उसी को लक्ष्य मान/बना लेते हैं |
कुछ लोगों को काटने[बुरा बोलने] की आदत होती हैं...................हमेशा आप को काट लेंगे |ऐसे लोगों के  काटे से बचने लिए मैंने एक टीका विकसित किया हैं –
लोगों को काटने[बुरा बोलने] के दुष्प्रभावो से खुद को कैसे बचाएं ?
जब भी आपको कोई काटें तो आप खुद से कम से कम २ बार कहिएं –
day by day in every way i am getting         better and better.
                                                              या
मेरी दुनिया में सबकुछ श्रेष्ठ एवं  .....                               
   कल्याणकारी हैं,


     अपने विचारों [सोच एवं धारणाओं] से अपनी दुनिया ह्म खुद बनातें  हैं ,कुछ लोग हमेशा नकारत्मक  ही सोचतें हैं जैसे –
गर्मी बहुत हैं.....[अरे गर्मी का मौसम हैं तो गर्मी ही होंगी]
मेरी दुनिया में सबकुछ बुरा होता हैं ...........[यक़ीनन बुरा ही होंगा क्यूंकि जो बोलेंगे /सोचेंगे वही होंगा जिन्दंगी  में...............]
जैसे हम लोगों के पास डायरी होती हैं ,वैसे भगवान के पास के पास भी एक डायरी हैं जिसमे एक ही शब्द हैं –
             तथास्तु
यदि हम सोंचे की हमारा जीवन उत्तम हैं |
तो भगवान ऊपरसे कहतें हैं
      तथास्तु

  यदि हम कहें की हमारे जीवन में कष्ट हैं तो भगवान उप्पर से कहतें हैं –
                      तथास्तु
सोचिये हमे तथास्तु कहा चाहिये  |हमे लगातार सकारात्मक सोचने की आदत डालनी होंगी |क्यूंकि हमारे विचारों के अनुसार त्वरित फल भगवान भी देतें हैं |
     इसलिए विचारों के सन्दर्भ में तो हमे सदैव सतर्क रहना होंगा |

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