17 May 2020

सब्सिडिया जो भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए अति आवश्यक है वही विवाद का विषय भी हैं

जब सार्वजनिक कल्याण के मकसद से खाद्य उर्वरक, रसोई गैस, मिट्टी का तेल( केरोसिन) आदि को लागत से कम दाम पर बाजार में बेचा जाए और लागत तथा बाजार कीमत के बीच के अंतर की भरपाई सरकार करें तो यह अंतर ही "सब्सिडी" कहलाता है| सब्सिडी योग्यता, आय स्तर , सामाजिक समूह आदि जैसे मानदंडों के आधार पर प्रदान की जाती है| सब्सिडी या भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए अति आवश्यक है जैसे- 1) उर्वरक सब्सिडी उर्वरक प्रयोग को बढ़ावा देती है कृषि उत्पादन में वृद्धि करती है ,साथ ही कुछ किसान उच्च मूल्य पर उर्वरकों की खरीद में सक्षम नहीं है, तो सब्सिडी से उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है| 2) सब्सिडी से अकुशल श्रम बल को रोजगार मिलता है .।कृषि आवश्यकता हेतु मानव पूंजी की उपलब्धता बनी रहती है| 3) कृषि सब्सिडीओं के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है साथ ही उचित भंडारण एवं पैकेजिंग व्यवस्था हेतु सुविधा उपलब्ध कराया जाता है| 4) सब्सिडी बीज वितरण, विपणन कृषि संबंधित प्रौद्योगिकियों, नवीन प्रौद्योगिकियों के क्रियान्वयन एवं प्रशिक्षण पद्धतियों , ऋण हेतु आश्वासन, मशीनों इत्यादि हेतु सहायता प्रदान करती है| इसके साथ ही आपदा प्रबंधन में बढ़ती आबादी के भरण पोषण हेतु फसलों की उपलब्धता को सुनिश्चित एवं संरक्षित करती हैं| फिर भी कुछ ऐसी वजह हैं जिनके कारण कृषि सब्सिडीया विवाद का विषय है - 1)सब्सिडी कृषि उत्पादन में उर्वरकों तथा कीटनाशकों के उपयोग को बढ़ावा देती हैं जिससे मृदा स्वास्थ्य प्रभावित होता है|ICAR( भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) ने फसलों और मिट्टी के आधार पर जैविक उर्वरक विकसित किए हैं जिससे फसल उत्पादन 10 से 20% बढ़ सकता है साथ ही महंगे रसायनिक उर्वरकों के उपयोग में 20 से 25% की कमी भी आ सकती हैं | 2)उच्च कृषि सब्सिडीओं के कारण सरकार कृषि क्षेत्र में पूंजी निर्माण पर पर्याप्त निवेश नहीं कर पा रही है जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार धीमा है| 3) कुछ खास फसलों पर सब्सिडी के कारण लोग उन्हीं फसलों के उत्पादन पर निर्भर हो रहे हैं जिससे क्रॉपिंग पैटर्न पर विपरीत प्रभाव पड़ा है साथ ही खाद्य मुद्रास्फीति का कारण भी बन रहा है| 4)पावर सब्सिडी के कारण भूजल का दोहन बढ़ा है, यदि भूजल का स्तर नीचे जाता है तो इससे ग्रामीण गरीबी भी बढ़ती है 5)सब्सिडीओं के कारण परंपरागत कृषि आगत तो जैसे हरी खाद आदि का उपयोग कम हो रहा है जबकि यह पर्यावरण व पारिस्थितिकी के मित्रवत हैं वहीं दूसरी ओर अंधाधुंध उर्वरक सब्सिडीओं से एनपीके के उपयोग से मृदा के साथ-साथ जलीय इकोसिस्टम को भी क्षति पहुंची है यूट्रोफिकेशन जलीय जीव जंतुओं के लिए जानलेवा साबित होता है जो किसी जलाशय में उर्वरकों के बाहर जाने से ZOOPLANKTONS एवं ALGAE के विकास एवं अधिक ऑक्सीजन उपभोग से उत्पन्न होता है इससे जलीय जंतुओं को ऑक्सीजन नहीं मिलती और उनकी मृत्यु हो जाती है 6) सब्सिडी का भुगतान सार्वजनिक ढंग से किया जाता है भ्रष्ट राजनेता ,नौकरशाह, बिचौलिए निजी हित में इनका अधिकांश भाग इस्तेमाल करते हैं कृषि अर्थव्यवस्था चारा घोटाला उर्वरक घोटाला और निधियों के प्रसरण हेतु चिन्हित की जाती है| 7) कृषि सब्सिडी अधिक कृषि उत्पादन हेतु सीमांत कृषि भूमियों के अतिक्रमण को बढ़ावा देती है जिसका उपयोग जंगलों आर्द्रभूमि यो या अन्य पर्यावरण संरक्षण उद्देश्य हेतु उपयोग किया जाता है सब्सिडी या मिश्रित फसलों के रोपण, पशुपालन मूल्य नियंत्रण जैसे नवाचारी कृषि प्रथाओं की तरफ ध्यान न देने का कारण होती है जरूरत है कि मजबूत बुनियादी ढांचा बनाकर किसान को आत्मनिर्भर बनाया जाए|

16 May 2020

प्रबोधन काल


प्रबोधन का अर्थ-
 पुनर्जागरण कालीन लौकिक चेतना मानवतावाद तार्किक  वैज्ञानिक खोजो को बल देने वाली प्रवृत्ति ने
18वीं शताब्दी में आकर परिपक्वता प्राप्त कर ली |चिंतन की यह परिपक्व अवस्था प्रबोधन के नाम
से जानी जाती हैं|
 विशेषताएं-
1) प्रबोधन कालीन चिंतन ने ज्ञान को विज्ञान से जोड़ा  और कहा कि हमारे लिए सत्य वही है,
जिसका प्रयोग व परीक्षण किया जा सके| वस्तुतः ज्ञान आस्था का विषय नहीं बल्कि तर्क एवं प्रमाण से
युक्त होता है|
2) मध्य युग में यह कहा गया कि सृष्टि ईश्वर द्वारा निर्मित है, उसे मानव द्वारा नहीं जाना जा सकता
अर्थात यह दुनिया मानवी समझ से परे है मध्यकाल में यह सूत्र वाक्य प्रचलित था
कि" जहां ज्ञान का प्रकाश नहीं होता वहां विश्वास की ज्योति से रास्ता दिखाई पड़ता है" इस तरह
मध्यकाल आस्था पर बल देता है|
 प्रबोधन कालीन चिंतन इस मान्यता  का खंडन करता है,एवं प्रयोग एवं परीक्षण
पर बल देते हुए " जानो तब मानो" की बात पर बल देता है|
3) कारण कार्य संबंधों का अध्ययन प्रबोधन के चिंतन का मुख्य तत्व है
वस्तुतः किसी भी घटना के लिए उसकी पूर्व की घटना उत्तरदाई होती है ,
अतः इस कारण को जानना आवश्यक है कि प्राकृतिक शक्तियों से मानव की रक्षा
की जा सके तथा मानव प्रकृति की शक्तियों एवं उसकी उर्जा का रचनात्मक प्रयोग कर सकें|
इतना ही नहीं सामाजिक संबंधों में मौजूद विषमता और उसके कारणों को जानने पर बल दिया गया|
4) प्रबोधन के  चिंतकों ने प्रकृति पर बल देते हुए कहा कि प्रकृति परिपूर्ण है
एवं सौंदर्य से परिपूर्ण है| इसी तरह मानव भी स्वतंत्र हैं किंतु
उस पर अनेक नियंत्रण लगा दिए और वह परतंत्र हो गया है
अतः मानव को प्रकृति की तरफ लौटना चाहिए जहां धर्म जाति एवं नस्ल का बंधन नहीं था| 
6)प्रबोधन के चिंतकों ने देववाद  पर बल दिया इसका तात्पर्य है
कि मानव कर्मकांड से मुक्त होकर आचरण करें इन चिंतकों
ने कहा कि कोई परमसत्ता जो सृष्टि का निर्माण करती है यदि
इस अवधारणा को मान लिया जाए तो इसका तात्पर्य सभी जीवो के
प्रति सहृदयता का व्यवहार करना चाहिए इसी प्रकार चिंतको ने स्पष्ट किया कि
चाहे किसी परम सत्ता ने सृष्टि का निर्माण किया हो किंतु सृष्टि को चलाने के लिए
मानव  पूर्णतया उत्तरदाई है| इस प्रकार चिंतकों ने ज्ञान को विज्ञान से जोड़ने ,
प्रयोग  एवं परीक्षण पर बल देने और कारणो पर बल देने के माध्यम से अनेक वैज्ञानिक
सिद्धांत एवं यंत्रों की खोज को संभव बनाया फलतः मशीनीकरण को बढ़ावा मिला जिसके
कारण भौतिक सुख सुविधाओं में वृद्धि हुई है |मानवतावाद एवं प्रकृति पर बल देते हुए चिंतकों ने
मानव की समता एवं स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया| फलतः  मानवीय मूल्यों को स्वतंत्र मिली |
इस दृष्टि से प्रबोधन कालीन चिंतन मानवीय मूल्यों की स्थापना पर बल देता है|

पुनर्जागरण :विश्व इतिहास

पुनर्जागरण
                                       पुनः जागना
 विश्व इतिहास को तीन भागों में बांटा जा सकता है


  1.  प्राचीन विश्व( आरम्भ  से पांचवी सदी)  
  2. मध्यकालीन विश्व( अभी से 16 वी  सदी)
  3.  आधुनिक विश्व (16 वी सदी  अब तक)
 रोमन साम्राज्य दो प्रशासनिक केंद्र 
1)पश्चिमी राजधानी रोम                            
 2) पूर्वी राजधानी कुस्तुनतुनिया (तुर्की)
  •  लौकिक  जीवन पर बल दिया जाता था 
  • मानव केंद्र में था 
  • मानव के तर्क एवं विवेक पर बल दिया गया  था 
  • मानव के चिंतन की स्वतंत्रता धर्म के बंधन से मुक्त 
  • मानव स्वतंत्र धार्मिक शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने लगा
  • मानव पुनर्जागरण
  पुनर्जागरण के कारण
1) धर्म युद्ध ईसाई vs इस्लाम
 परिणाम 1) 
  • ईसाई धर्म के पॉप ने  अपने सेना को विजय होने का आशीर्वाद दिया था
  •  किंतु धर्म युद्ध में इस तरह की पराजय हो गई 
  • अतः धर्म की सत्ता के प्रति संशय पैदा हुआ
  •  अधर्म की पकड़ से मानव मुक्त होने लगा 
  • मानव के तर्क विवेक को प्रोत्साहन मिला
2) युद्ध में सामंतों का धन एवं बाल समाप्त होने लगा
  •  सामंतवाद का पतन 
  • धार्मिक गतिशीलता बढ़ने लगी
  •  पुनर्जागरण चेतना का विकास हुआ 
3)कुस्तुनतुनिया पर इस्लाम के अनुयायियों का नियंत्रण
  •  अतः भूमध्य सागरी व्यापार बाधित हुआ 
  • अतः नए मार्ग की जिज्ञासा 
  • आवश्यकता बड़े भौगोलिक खोजों को प्रोत्साहन मिला
  •  कोलंबस /वास्कोडिगामा अपने अपने मिशन पर निकल गए 
  • अन्य को भी प्रेरणा मिली 
  • साहस एकता का विकास
2) कुस्तुनतुनिया का पतन
  •  कुस्तुनतुनिया पर इस्लाम का नियंत्रण
  •  अतः यहां मौजूद यूरोपी विद्वान कलाकार भागकर निकट के क्षेत्र में पहुंचे 
  • वे अपने साथ ग्रीक एवं लेकिन साहित्य भी ले गए
  •  इसमें प्राचीन रोमन साम्राज्य की मानवतावादी लौकिक  चेतना की प्रवृत्तियां वर्णित  थी
  • अतः  इन ग्रंथों का ज्ञान होने लगा 
  • और अतीत से  प्रेरित होकर वर्तमान को बदलने का भाव/ प्रेरणा पैदा हुए
  •  अतः मानव  की क्षमता और तर्क विवेक को प्रोत्साहन मिला 
  • इससे पुनर्जागरण चेतना का उदय हुआ|
3) प्रिंटिंग प्रेस का विकास
  •  धार्मिक एवं वैज्ञानिक चिंतन का प्रचार होने लगा 
  • अतः  बाइबल का अनुवाद  स्थानीय भाषा में होने लगा
  •  अब ज्ञान सर्व सुलभ हो गया
  •  अतः  'बाइबल में ऐसा लिखा है कह कर' 
  • लोगों को गुमराह नहीं किया जा सकता
  •  मानव धर्म के माध्यम से मुक्त होने लगा
  •  पुनर्जागरण चेतना का उदय हुआ

स्वदेशी आंदोलन...आत्मनिर्भरता का आंदोलन

प्रश्न :-स्वदेशी आंदोलन का वर्णन करते हुए इसका भारतीय जनजीवन पर पड़े प्रभाव का मूल्यांकन करिए|
उत्तर- बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत 1905 में हुई|इस आंदोलन की निम्न विशेषताएं थी-
1)विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना
2) सरकारी स्कूलों अदालतों और उपाधियों का बहिष्कार करना| वस्तुतः बहिष्कार का सर्वप्रथम सुझाव कृष्ण कुमार मित्र ने अपनी पत्रिका संजीवनी में दिया था
3)आत्मनिर्भरता  हेतु राष्ट्रीय शिक्षा एवं स्वदेशी पर बल देना|
4) रचनात्मक कार्यों पर बल देकर सामाजिक सुधार करना, जैसे बाल विवाह ,दहेज प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाना |

आंदोलन की कार्य पद्धति


1) विभिन्न समितियों का गठन कर हड़तालओं का आयोजन करना| इसी क्रम में बारिसाल
कोलकाता में अश्विनी कुमार दत्त ने "स्वदेश बांधव समिति" का गठन किया, और लोगों को एकजुट किया इन समितियों द्वारा जन जागरण के क्रम में व्याख्यानो का आयोजन होता था| कार्यकर्ताओं को नैतिक प्रशिक्षण दिया जाता था| इस तरह जनता को साथ लेकर ब्रिटिश विरोधी कार्यक्रम चलाया गया
2) महिलाओं द्वारा धरना प्रदर्शन कार्यक्रम चला|
3) धार्मिक प्रतीकों एवं नारों का प्रयोग कर लोगों को संगठित किया गया इसी क्रम में पारंपरिक त्योहारो , लोक नाट्य मंचो का उपयोग करते हुएआंदोलन जनता तक पहुंचाया गया| वस्तुतः रक्षाबंधन गणेश महोत्सव शिवाजी महोत्सव आदि के माध्यम से लोगों को एकजुट किया गया|
4) निष्क्रिय प्रतिरोध द्वारा सरकार विरोधी आंदोलन चलाया गया जिसके तहत असहयोग, बहिष्कार, धरना प्रदर्शन आदि पर बल दिया गया|

प्रसार


1)स्वदेशी आंदोलन की विधिवत शुरुआत 7 अगस्त 1950 को कोलकाता के टाउन हॉल की बैठक हुई जिसमें विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का निर्णय लिया गया बंगाल विभाजन के दिन 16 अक्टूबर उन्नीस सौ पांच को शोक दिवस एवं हिंदू मुस्लिम एकता दिवस के रूप में मनाया गया एकता प्रदर्शित करने के लिए लोगों ने एक दूसरे के हाथ में राखी बांधी |
2)यह आंदोलन बंगाल के बाहर भारत के विभिन्न भागों में फैला तिलक ने पुणे में तो लाला लाजपत राय ने पंजाब में सैयद हैदर रजा ने दिल्ली में एवं चिदंबरम पिलाई ने मद्रास में आंदोलन का नेतृत्व किया इसका आंदोलन अखिल भारतीय स्वरूप लिए हुए था|
3) तिलक का गणपति उत्सव एवं शिवाजी उत्सव न केवल महाराष्ट्र में बल्कि बंगाल में भी स्वदेशी आंदोलन का प्रमुख माध्यम था|

सामाजिक आधार


1) आंदोलन में विद्यार्थी मुख्य कर्ताधर्ता से उन्होंने सरकारी स्कूलों का बहिष्कार किया|
2) महिलाएं पहली बार घर से बाहर निकल कर जुलूस में शामिल हुए|
3) बंगाल के बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय की भागीदारी नहीं रही वस्तुतः अधिकांश उच्च एवं मध्य वर्ग के नेता आंदोलन से दूर रहे या बंगाल विभाजन का समर्थन किया जैसे ढाका के नवाब सलीमुल्लाह ने बंगाल विभाजन का समर्थन किया किंतु फिर भी अब्दुल रसूल लियाकत हुसैन शायद हैदर रजा जिससे प्रगतिशील मुस्लिम आंदोलन में शामिल है
4) किसान इस आंदोलन से अलग रहा आंदोलन में किसानों की मांगे शामिल नहीं थी वह जमीदारों के शोषण से पीड़ित थे|

मूल्यांकन योगदान;-


1) स्वदेशी आंदोलन में राष्ट्रवाद के वैचारिक आधार का विस्तार किया|
2) स्वदेशी आंदोलन दिन नई राजनीतिक पद्धतियां जैसे जन आंदोलन, बहिष्कार, धरना प्रदर्शन तथा रचनात्मक कार्यों को प्रारंभ किया यह नयी पद्धतियां,नई सदी के आंदोलन की मुख्य विशेषता बन गई|
3) इसी पर बल देने के क्रम में भारतीय उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहन मिला| इसी क्रम में वस्त्र उद्योग, माचिस उद्योग, बंगाल केमिकल, जैसी स्वदेशी इकाइयों की स्थापना हुई| साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना हुई| जिसका उद्देश्य वैज्ञानिक एवं राष्ट्रवादी शिक्षा का प्रसार करना था| इसी क्रम में बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई जिसके प्रथम प्राचार्य अरविंद घोष थे|
4) स्वदेशी आंदोलन की सांस्कृतिक क्षेत्र में उपलब्धियां उल्लेखनीय रही, रविंद्र नाथ टैगोर जितेंद्र नाथ सराय, दक्षिणा रंजन एवं रजनीकांत सेन साहित्यकारों ने बांग्ला साहित्य का विकास किया रविंद्र नाथ टैगोर ने आमार सोनार बांग्ला नमक गीत लिखा जो आगे चलकर बांग्लादेश का गौरव गान बना|शिप्रा दक्षिणा रंजन ने ठाकुरमार झूठी (दादी मां की कथाएं) लिखी जो आज भी बच्चों को प्रेरित करती हैं|
5) चित्र कला के क्षेत्र में अविंद्र नाथ टैगोर, मुगल एवं राजपूत चित्रकला से प्रेरित होकर स्वदेशी चित्र कला का विकास किया तो नंदलाल बोस ने कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करते हुए कला की छात्रवृत्ति प्राप्त की|

सीमाएं-


1) आंदोलन में धार्मिक प्रतीक एवं नारों का प्रयोग किया गया, लगता है सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला
2)आंदोलन की कार्य पद्धति के संदर्भ में उदारवादी एवं उग्रवादी नेताओं के बीच मतभेद बढ़ा|इसके परिणाम स्वरूप 1907 में सूरत में कांग्रेस का विभाजन हो गया|

निष्कर्ष-


1) स्वदेशी आंदोलन भारत में आधुनिक राजनीति के आरंभ कर्ता के रूप में देखा जाता है ,इससे राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा प्राप्त हुई और आंदोलन नई प्रवृत्तियों संयुक्त हुआ |वस्तुतः नई सदी के साथ ही, नई रुचियां नए लक्ष्य नई पद्धतियां सामने आई | 
नई रुचियां थी राजनीतिक उदारवाद से राजनीतिक उग्रवाद की विचारधारा....  
नयी  पद्धतियां थी निष्क्रिय प्रतिरोध के तहत धरना प्रदर्शन ,बहिष्कार को अपनाना
 तो नया लक्ष्य था स्वराज की प्राप्ति करना|
(यह उत्तर डॉक्टर अजय यादव द्वारा गूगल वॉइस टाइपिंग से लिखा गया है)

10 May 2020

सोशल मीडिया,दुरुपयोग और सतर्कता से जुड़े रिसेंट मुद्दे


सामाजिक नेटवर्किंग सेवा एक ऑनलाइन जरिया हैं जिससे लोगों के बीच सामाजिक नेटवर्किंग अथवा सामाजिक संबंधों को स्थापित किया जा सकता हैं |उदाहरण के लिए ऐसे व्यक्ति जिनकी रुचियां अथवा गतिविधियां समान होती हैं।  यह एक अपरंपरागत मीडिया (nontraditional media) है|
अभी जल्द ही BPRD; Bureau of police research and development ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए स्टेप टू स्टेप गाइड प्रकाशित किए Jiska uddeshy फेक news (येलो जर्नलिज़्म) aur video ko पहचानना Jo घृणा  aur communal hinsa ko failate Hain॥जिसका परिणाम दिल्ली दंगों के रूप में देखा जा सकता है |हाल में हुई पालघर मे साधुओ की हत्या की घटना इसका उदाहरण है, कुछ दिनों से फेक न्यूज़ चल रही है कि देश के गृहमंत्री गंभीर रूप से बीमार है जबकि वह स्वस्थ है |आर्थिक राजनीतिक लाभ लेने पहुँच को बढ़ाने के लिए अक्सर कुछलोग सनसनीखेज खबर फैलाते हैं ।
कई देशों ने सोशल मीडिया पर निगरानी के लिए बेहतर नियंत्रण तंत्र विकसित किया है यदि कोई सोशल मीडिया या अन्य साधनों के जरिए झूठी खबर फैलाता है तो उसे तुरंत पकड़ लिया जाता है|
इस मामले में वहां का समाज भी अधिक जागरूक है वहां का समाज फर्जी खबर फैलाने वाले लोगों का बहिष्कार कर देता है और कुछ नजर से देखता जाता है लेकिन भारत में इस प्रकार की जागरूकता नहीं है, सोशल मीडिया के नियमन की मांग नहीं huyi है ,जब-जब इसका दुरुपयोग हुआ है  तभी इसकी मांग हुई है|
व्हाट्सएप और फेसबुक द्वारा फेक न्यूज़ के खिलाफ दिए जा रहे विज्ञापन इसी सतर्कता ka hissa हैं। साइबर विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि अपनी पोस्ट या अकाउंट पर आप जो कुछ शेयर करते हैं उसके लिए आप ही जिम्मेदार है
सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते समय दिन में तीन बातो को ध्यान में रखाना चाहिए
1) किसी भी खबर को सोशल मीडिया पर शेयर करने से पहले उसके स्रोत की पड़ताल जरूर कीजिए।

2) किसी भी समाचार इतिहास से जुड़ी जानकारी और गंभीर मसले से संबंधित सूचना को आगे बढ़ाते समय अन्य कई सारे प्रमाणित स्रोतों से भी मिला लेना चाहिए कोशिश
3)कीजिए कि किसी मुद्दे पर हर तरफ को विचारों को जानने की।
जांच के लिए वेबसाइटो को एसेस किया जा सकता है जैसे हिंदू डॉट कॉम ,पीआईबी gov.in, रिपोर्टर लैब डॉट कॉम और भी अन्य कई शामिल है।
सरकार द्वारा जारी मैनुअल में संप्रदायिक कोन की पहचान के लिए गाइडलाइन में एक फेक वीडियो का स्क्रीनशॉट लगाया है जिसमें मुसलमानों पर साफ प्लेटो और चमचों से बड़े पैमाने पर लोगों को वायरस स्थानांतरित करने का आरोप लगाया गया है।
एक क्लिप को भी लगाया गया है जहां उपद्रवियों ने नकली यूआरएल यूनिफॉर्म रिसोर्स लोकेटर के जरिए उन लोगों को गुमराह करने की कोशिश किया जो पीएम केयर फंड में दान देना चाहते थे Google reverse image search ka istemal करके  videos ke liye police aur Anya agency जांच kar sakte हैं।
भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत बताते हैं की बाहरी ताकतों का चुनाव में हस्तक्षेप चिंताजनक है इसके लिए सोशल मीडिया को हथियार बनाया गया है यह किसी देश को खत्म करने का एक नया तरीका है।
दुश्मन राष्ट्र सोचते हैं कि वर्तमान समय में लड़ाई करने का कोई मतलब नहीं है ।
उससे कहीं बेहतर है वहां असक्षम सरकार खड़ी कर दी जाए जिससे वह देश स्वयं खत्म हो जाएगा ।
सोशल मीडिया के जरिए मतदाता को प्रभावित किया जाता है ताकि वह किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष में मतदान करें ,यह काम विदेशी शक्तियां करती हैं जो सोशल मीडिया के माध्यम से देश और समाज को जाति धर्म संप्रदाय आदि के आधार पर बांटने की साजिश करती हैं।
जिससे आवाम एक असक्षम सरकार को चुनाव कर लेती है इसके बारे में ना तो जनता को जानकारी होती है नहीं राजनीतिज्ञों को उन्हें अंदाजा होता है कि यह कितना बड़ा खतरा है। भारत के चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल और नियमन के लिए अक्टूबर 2013 में दिशा निर्देश जारी किए थे इन नियमों के अनुसार सोशल मीडिया को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कानूनी परिभाषा के दायरे में लाया गया.
इन नियमों के बाद चुनाव के आखिरी 48 घंटों में पार्टियां प्रत्याशियों द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से चुनाव प्रचार नहीं किया जा सकता|

18 April 2020

चिकित्सको की कमी पूरी करेंगी :टेलीमेडिसिन तकनीक

दूर बैठे किसी स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर द्वारा सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग करके किसी मरीज की बीमारियों या चोट पर परामर्श प्रदान करना टेलीमेडिसिन कहलाता है |
स्वास्थ्य एवं परिवार मंत्रालय ने 25 मार्च 2020 को नयी गाइडलाइन जारी की है जिसके अनुसार केवल रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर ही टेलीमेडिसिन से परामर्श दे पाएंगे |

उपयोगिता:-

  1.  सुदूर स्वास्थ्य सुविधा वंचित भागों तक पहुंच|
  2.  मरीज के  परिवहन में समय और लागत की बचत|
  3.  गंभीर देखभाल वाला मरीज ,जिसे स्थानांतरित करना मुश्किल होगी ,की निगरानी |
  4. चिकित्सा शिक्षा  नैदानिक के अनुसंधान में मदद
  5.  आपदा में भी चिकित्सा सुविधाएं अनवरत|
  6.  रोबोट्स द्वारा उच्च दक्षता की स्वास्थ्य  टेलीमेटेड सर्जरी
  7.  महामारी की आशंका में रियल टाइम निगरानी
 चुनौतियां 
  1.  विकसितक्षेत्रों में कमजोर इंटरनेट, वीडियो कांफ्रेंसिंग में बाधा पहुंचाता है
  2.  कुछ बीमारियों  का निदान मुश्किल जैसे नाक कान गला आदि
  3.  यदि सरकारी नीतियों  के अनुसार केवल रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर इलाज कराएं करेंगे गूगल फेसबुक मेसेंजर द्वारा कैसे पता चलेगा कि कौन परामर्श दे रहा है 
सरकारी प्रयास
1) संजीवनी-
  •  वर्ष 2005 में केंद्र सरकार ने जारी किया संजीवनी सॉफ्टवेयर  टेलीमेडिसिन हेतु |
  • स्टोर एवं फॉरवर्ड कांसेप्ट
2) सेहत -
  • वर्ष 2015 में केंद्र सरकार द्वारा अपोलो अस्पताल के साथ मिलकर
  •  60000 कॉमन सर्विस सेंटर
3)   कान टिक-
  •  कोविड-19 नेशनल टेलीकंसल्टेशन सेंटर का संक्षिप्त नाम|
  • 2020 से शुरू
  •  एम्स दिल्ली द्वारा जारी

 अतः हम कर सकते हैं टेलीमेडिसिन  प्रायोगिक की प्रौद्योगिकी के द्वारा मानवता का संरक्षण है |यह  टेक्नोलॉजी जिन ऊंचाइयों की हकदार है ,अभी नहीं प्राप्त कर पाई है ,पर अब सरकारें भी इसमें रुचि लेने लगी है आपदा प्रबंधन में जैसे वर्तमान में कोरोना  प्रसार के दौरान टेलीमेडिसिन का महत्व दुनिया को समझ में आ रहा है|

17 April 2020

कोरोना प्रसार एव बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव

पूरे विश्व में अपना भू राजनीतिक एवं व्यापारिक प्रभुत्व कायम करने के उद्देश्य 2013 ईस्वी में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने “वन बेल्ट वन रोड परियोजना” शुरू की जिसे 2016  से “बेल्ट एंड  रोड इनीशिएटिव" के नाम से जाना जाता है| यह एशिया, यूरोप तथा अफ्रीका के बीच भूमि एवं समुद्री क्षेत्र में कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए चीन द्वारा संचालित परियोजनाओं का एक समूह है इसके अन्य नाम सिल्क रोड इकोनामिक बेल्ट  एव 21वीं सदी की   सामुद्रिक सिल्करोड है|

 बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव परियोजना से जुड़े देशों में कनेक्टिविटी  व लॉजिस्टिक्स की सुविधा बेहतर हुई, फलस्वरुप परियोजना के क्रियान्वयन से संबंधित कर्मचारियों के आवागमन से इटली ,पोलैंड, ग्रीस, ऑस्ट्रिया, पुर्तगाल लक्जमबर्ग और स्विट्जरलैंड में भी  कोरोना वायरस का प्रसार द्रुतगति से हुआ |अमेरिका द्वारा आरोपित आर्थिक प्रतिबंधों से तंग ईरान ने भी 2019 में BRI परियोजना पर हस्ताक्षर किए ,ईरानी स्वास्थ्य विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के कर्मचारियों यहां चीन से लौटने वाले व्यापारियों से कोरोना  ईरान में फैला| चीन के वुहान सीफूड मार्केट से दुर्लभ में पशु पक्षियों का मांस BRI परियोजना से जुड़े देशों में निर्यात हुआ जिससे अन्य देश बड़े स्तर पर प्रभावित हुए| भारत भले ही इस परियोजना का हिस्सा नहीं है पर प्रथम तीन कोरोना संक्रमित वुहान  से ही आए थे|
 कोरोना वायरस का प्रसार चीन की निर्माण और निवेश परियोजनाओं में देरी और व्यवधान उत्पन्न करने के साथ-साथ वर्षों के परिश्रम एवं  अरबो डालर की क्षति पहुंचा रहा है |यद्यपि विश्व की अन्य परियोजनाएं भी (CPEC,इंडोनेशिया में हाई स्पीड रेल योजना, श्रीलंका में बंदरगाह निर्माण योजना)  भी बाधित है |विभिन्न देश जो BRI पर प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं उनकी वजह से चीन आर्थिक रूप से तनाव में है जिन देशों को उसने ऋण जाल में फंसाया है उसने उनसे वह वसूली कर सकता है|
 यद्यपि भारत प्रत्यक्ष रूप से BRI परियोजना का हिस्सा नहीं है पर इस परियोजना के प्रतिबंध से भारत की सामरिक चिंताएं कम होंगी एवं भारत को घेरने की चीन की नीति को धक्का पहुंचेगा किंतु चिंता इस बात की भी है किस चीन द्वारा ऋण प्राप्त भारत के पड़ोसी (श्रीलंका ,पाकिस्तान ,बांग्लादेश ,नेपाल) ऋण चुकाने में विफल रहे तो चीन इन देशों को अपना उपनिवेश बना सकता है जो भारत के सामरिक एवं रणनीतिक हितों को चुनौती देगा|

 अतः संकट की इस घड़ी में विश्व की समस्त महा शक्तियों को मिलकर साधनों का अधिकतम प्रयास करके महामारी की हरसंभव रोकथाम करनी चाहिए| इनको अपने रिसर्च डब्ल्यूएचओ एवं अन्य देशों के साथ सहयोग करके वायरस के प्रसार रोकने का सामूहिक उपाय करना चाहिए|
-डॉ अजय यादव

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